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Wednesday, July 8, 2026

आशाओं के अंकुर

कागा जैसा रूप मिला, 
और वाणी जैसे दादुर।
पर अपनी मस्ती में 
रहते वीर बहादुर।।

इक इक कर सब साथ छूट गए,
होते गये सभी दूर।
अनगिनत चोटों से सारे 
घाव हुए थे नासूर।।

पल पल सबने तानें मारे, 
रही नियति निष्ठुर।
फिर भी नहीं किस्मत को कोसा, 
डटे रहने को आतुर।।

खुद से खुद को खूब तराशा, 
तोड़ी वेदना भंगुर।
हर क्षण दृढ़ विश्वास से बोते 
आशाओं के अंकुर।।

– अमित पाठक शाकद्वीपी 

Monday, April 6, 2026

शकुंतला दुष्यंत


कितना बेहतर जीवन था, दिन थे कितने गुलजार।
उपवन बीच बसेरा अपना, पुष्पों की थी सजी बहार।।
आए एकदिन राजकुंवर फिर करने को था रहा शिकार।
यहां वहां पशुअन के पीछे ले धनुष बाण तैयार।।

कोशिश कर के मृग को साधा, मूक प्राणी वह बड़ा लाचार।
फिर भी नृप को दया न आई कर डाला उसने प्रहार।।
तत्क्ष्ण आ पहुंची शकुंतला, वन देवी सा रहा श्रृंगार।
मोहित हो गए राजकुंवर तब जब देखा ऐसा व्यवहार।।

बात बात में परिचय जाना, जाना मात पिता का नाम।
इतनी सुंदर कन्या का भला क्या वन में काम ?
कहती कन्या कि वास यहीं है यहीं हमारा धाम।
पशु पक्षी के इस उपवन में आता हमें भी खूब आराम।।

तभी कुंवर ने ब्याह की उनसे कर दी बात।
दोनों ने संग दिवस बिताया बीती सुखमय रात।।
एक दिन का बस प्रेम जाता कर राजा नगर को लौटे।
रही शकुंतला राहें तकती वादे सब निकले झूठे।।

दिवस दिवस तक भूखी रहती, जाग बिताए रैन।
दुष्यंत के याद में पल पल रोते रहते नैन।।
दिन भी बीता माह बीत गए लेकिन प्रिय न आएं।
विरह अग्नि में तपती कन्या ने ऐसे थे सुत जाए।।

भरत जन्म पर उत्सव सा था, मिलने लगी बधाई।
लेकिन अब तक भी दुष्यंत को न याद शकुंतला आई।।
वर्षों बाद जब पुनः थे राजा वन को आए। 
देख भरत को शावक के संग नृप बड़े घबराए।।

पूछा कौन हो, क्या है परिचय, यहां कहां रहते हो?
बड़े भयावह इस उपवन में पीड़ा क्यों सहते हो।।
पीड़ा की यहां बात नहीं है, ये निज धाम हमारा।
चलिए चल कर देख लीजिए होता है कैसे है गुजारा।।

गए पुनः जब आश्रम में तभी भ्रांति टूटी।
जाग उठी तब हाय री किस्मत जो बरसों से थी फूटी।।
शकुंतला को दुष्यंत को फिर से मिला सहारा।
भरत को भी राज गृह का मिला इशारा।।

उपवन सा ही महका रिश्ता रोशन हुई गृहस्थी।
तब से अब तक भारत भू की भरत नाम से हस्ती।।

– अमित पाठक शाकद्वीपी 

Tuesday, February 17, 2026

व्याकुल सी जब राधिके


व्याकुल सी जब राधिके चाहे कुछ आराम, 
सेज नहीं, न आसन भाये, चाहे केवल श्याम।
कांधे पर जब शीश धरे, तब मन को हो विश्राम,
प्रीत मीत के गीत सुनाए, भूले सारा काम।।

गोप ग्वाल से दूर कहीं जब कान्हा वन को जाए,
पद चिन्हों को तकती राधा पीछे पीछे आए।
निर्जन से उस कानन में फिर लता पत्र मुस्काऐं, 
हैं प्रेम से साक्षी सारे मन ही मन हर्षाऐं।।

दिनकर भी वह रूप निहारे, खुद भी खूब लजाये,
नेह मिलन में हो न बाधक, सो बस ढलता जाये।
वृक्ष, डाल, ये पत्र पुष्प सब, प्रेम मग्न हो डोले,
प्रेम अगन में जलते मन में शीतलता भी घोले।।
 
– अमित पाठक शाकद्वीपी 

Tuesday, December 16, 2025

प्रेमानुभूति


श्री राधे में खो गए मोहन कुंज बिहारी, 
ज्यों है देखो प्रेम मग्न उनकी राधा प्यारी।
अद्भुत शोभा है तन मन की लीला कितनी न्यारी,
राधा के रंग रंग से गए हैं माधव कृष्ण मुरारी।।

प्रेममयी भाव भंगिमा, दिव्य मृदुल मुस्कान,
हाथ लिए एक वेणु से प्रभु जी छेड़े तान।
चंद्र सरिस श्री राधिका मेघ सरिस भगवान,
एक दूजे में रमे हुए हैं, एक दूजे के प्राण।।

कानो में कुंडल झलकाया, मस्तक पर है चंदन,
एक टक नैना देखें तुझको मौन भाव से वंदन।
राधिका के तन पर भी ये दिव्य वस्त्र आगराए,
पाकर स्पर्श हवा के ये कुंतल नागिन सी बलखाए।।

हरी हरी ये चूड़ियां हरि में खोती जाए,
जब जब श्याम निहारे इनको राधे भी हर्षाए,
मांग टिका भी स्वर्णिम और बिंदी सजी लीलार, 
दिव्य प्रीत की अनुभूति अनुपम इनका प्यार।

अमित तेरी ये लेखनी चाहे जितना चाहे,
किंतु अलौकिक प्रेम को शब्दों में कैसे सजाए।
मैं मतिहीन लिखूं वही, जितना मुझको आए,
क्षमा करना श्री राधिके, कोई चूक अगर हो जाए।
                  – अमित पाठक शाकद्वीपी 


Saturday, December 13, 2025

संस्मरण

क्या बताऊं कहां से शुरुआत करूं, कुछ समझ नहीं आ रहा। यादें इतनी सारी हैं कि एक संस्मरण में उसे समाहित कर पाना ही मुश्किल है। स्कूल में गुजारे यूं तो सारे ही दिन बड़े अच्छे और यादगार गुजरे थे फिर भी एक किस्सा आप सभी के साथ साझा करता हूँ। हमारी आठवी कक्षा की बोर्ड की परीक्षा चल रही थी और उन दिनों हम बड़े मस्ती भी किया करते थे। पूरी कक्षा ने मिल कर एक प्लान बनाया कि सब मिल कर एक दूसरी की मदद करेंगे। पहले दिन की परीक्षा आरंभ हुई और अपनी कक्षा में एक बड़े सौम्य से शिक्षक आए जिन्होंने हमें खुली छूट दे दी थी। ऐसा मौका भला कौन छोड़े हमने भी जमकर चिटिंग की, एक दूसरे से खुल कर पूछताछ यहां तक की कॉपियां भी बदल ली थी। बड़ा मज़ा आया खुशी खुशी उस दिन की परीक्षा खत्म कर के घर वापस आ गए। अगले दिन जब दूसरे दिन की परीक्षा के लिए हमने कमरे में कदम ही रखा था तो गज़ब कांड हुआ पड़ा था। पिछले दिन की घटना का सारा विवरण जब प्राचार्य महोदय के पास गया तो परिणाम ये हो गया कि कमरे की सारी कुर्सियाँ मेज सब बाहर कर दिए गए और दरियां बिछा दी गई। आदेश ये हुआ की अब पूरी परीक्षा इन पर बैठ कर ही देनी है। सारा प्लान फेल हो गया हमारा।
गुरु जी के आगे हमारी एक न चली। हम सब पास तो हो गए पर पूरी कक्षा विद्यालय में सबके नजरों में आ गई। 
                      – अमित पाठक शाकद्वीपी 


Thursday, December 11, 2025

जलने लगा अलाव

जलने लगा अलाव 
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अमित कोई अब मीत नहीं है 
बदले सबके स्वभाव,
कुछ वाणी कुछ कर्मों से 
देते हैं हर पल घाव।

न साथी, न हित हितैषी, 
झूठा सबका बर्ताव,
हाय बर्फ सी जमीं ख्वाहिशें, 
चलता न कोई दांव।

व्याकुल मन के इस ठिठुरन से, 
करने को स्वयं बचाव।
जला दिया तब अरमानों को,
ज्यों हो जलने लगा अलाव,

सपने सारे जब राख हुए तब, 
मिला कहीं ठहराव।
वरना उम्मीदों के बोझ से, 
थकने लगे थे पांव।

जब जब खुशियां खोने लगे 
और दुःख का होता फैलाव,
ऐसे पल में रहो अकेले, 
होता बेहतर अलगाव।

द्वेष लहर से कहीं है बेहतर,
शीत लहर प्रभाव,
ढाल सरिस ही मिल जाते हैं,
जगह जगह अलाव।

पर द्वेष से जलते तन को,
केवल मिला तनाव,
भटके इस दर से उस दर तक,
कहीं नहीं पड़ाव।
            – अमित पाठक शाकद्वीपी 



Wednesday, December 10, 2025

नव प्रभात

क्या वर्णन करूं मैं 
उस दिव्य प्रकाश का, 
जिसने रास्ता दिखा दिया 
तिमिर को संन्यास का।

क्या अद्भुत दृश्य था 
उस पल आकाश का,
आगमन जब हुआ 
नव प्रभात में उजास का।

धारण किया था गगन ने 
कुछ लाल लिबास सा, 
सुशोभित था वर्णक्रम भी 
ज्यों अनुप्रास सा।

उस प्रभा के तेज पुंज में 
कुछ तो था खास सा, 
मैं देखता गया एकटक 
मानो बदहवास सा।।

– अमित पाठक शाकद्वीपी 

Tuesday, December 9, 2025

बड़ी बहु


कल कहीं दूर देश से 
आए थें कुछ सज्जन,
देख उनको अपने गृह में, 
हर्षित हो उठा था ये मन। 

बड़ी बहु ने स्वागत सहित जब, 
कराया उनको भोजन,
तरह तरह के भोग बने थे, 
तरह तरह के व्यंजन।

हाय कचौरी हाय जलेबी, 
पूरी सब्जी खीर,
महक से उनके घर भर जाता, 
होता था मन ये अधीर।

लेते ही फिर प्रथम निवाला, 
स्वाद ने यूं जादू कर डाला,
वाह वाह की ध्वनि सुनाई,
किसने यह आहार बनाई।

बड़ी बहु की उस मेहनत का 
होने लगा बखान,
हाथों में क्या दिव्य स्वाद है 
होता था आह्वान।

बूढ़े चाचा ने बात बताई,
निकाली एक पोटली छुपाई,
रखी कहीं जो पाई पाई
देने को थे आगे बढ़ाई।

कुछ पैसे वो नेग लगाकर 
देने लगे न्यौछावर,
अन्नपूर्णा है बहु हमारी 
देते सब आशीष मनोहर।

उस दिन बड़ी बहु को
मिला था उसका मान,
बाकी दिन के सब कामों 
कहां किसी को ध्यान।

चूल्हे की वह लौ में तपती,
दिन भर खटती, चुप सब सहती।
घरवाले फरमाइश करके करते बस परेशान,
क्या कैसे किस हाल में है नहीं किसी को भान।

शौक छोड़ वो लगी पड़ी है,
सदस्यों के पालन पोषण में,
खुद की आभा खोती गई है, 
सबकी ज्योति के रोशन में।

अब भी गर न त्याग को समझा,
जाना नहीं समर्पण,
नारी खुद से कुछ न कहेगी,
मौन है उसका गर्जन।

कुछ करनी उसकी सेवा का 
उसको कोई मान तो दो,
केवल वो क्यों ध्यान धरे फिर,
तुम भी उस पर ध्यान तो दो।

कल सुबह जब भोजन पर बैठो,
तो उनकी करो बड़ाई,
रोग कष्ट सब भूल के जिसने,
थाली तेरी सजाई।

– अमित पाठक शाकद्वीपी 



Monday, December 8, 2025

धिक्कार है

प्रेम पथिक की अभिलाषा का क्यों ऐसा उपहास किया, 
बार बार छलने को ही बस प्रयास किया।
अनसुना कर गए बात और वादा भी कहां साकार है,
निर्लज्ज तुझको लाज न आई, तुझपे तो धिक्कार है।।

स्वांग रचा कर चले गए तुम याद मेरी न आई,
प्रेम नहीं बस दिखावा था क्या? समझ नहीं मैं पाई।
मन से खुद को सौंप दिया था, क्या उसका ये उपहार है? 
निर्लज्ज तुझको लाज न आई, तुझपे तो धिक्कार है।।

हाय मोम सी रही मैं नाजुक, लोहे सा प्रहार किया,
मन को देकर दुख की ज्वाला जीना यूं दुश्वार किया।
तू झूठा बातें भी झूठी बिलकुल ही मक्कार है,
निर्लज्ज तुझको लाज न आई, तुझपे तो धिक्कार है।।

अब तो मैं न नेह लगाऊं, रहूं अकेली पास न आऊं,
सारी यादें माटी कर दूं, या गंगा में उन्हें बहाऊं।
देखो मेरे पास न आना, ये नारी अब तलवार है,
निर्लज्ज तुझको लाज न आई, तुझपे तो धिक्कार है।।

                  – अमित पाठक शाकद्वीपी

Wednesday, November 26, 2025

मंगल अभिषेक

गणाधिपो भानु-शशी-धरासुतो बुधो गुरुर्भार्गवसूर्यनन्दनाः ।
राहुश्च केतुश्च परं नवग्रहाः कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ १॥

उपेन्द्र इन्द्रो वरुणो हुताशनस्त्रिविक्रमो भानुसखश्चतुर्भुजः ।
गन्धर्व-यक्षोरग-सिद्ध-चारणाः कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ २॥

नलो दधीचिः सगरः पुरूरवा शाकुन्तलेयो भरतो धनञ्जयः ।
रामत्रयं वैन्यबली युधिष्ठिरः कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ ३॥

मनु-र्मरीचि-र्भृगु-दक्ष-नारदाः पाराशरो व्यास-वसिष्ठ-भार्गवाः ।
वाल्मीकि-कुम्भोद्भव-गर्ग-गौतमाः कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ ४॥

रम्भाशची सत्यवती च देवकी गौरी च लक्ष्मीश्च दितिश्च रुक्मिणी ।
कूर्मो गजेन्द्रः सचराऽचरा धरा कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ ५॥

गङ्गा च क्षिप्रा यमुना सरस्वती गोदावरी नेत्रवती च नर्मदा ।
सा चन्द्रभागा वरुणा त्वसी नदी कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ ६॥

तुङ्ग-प्रभासो गुरुचक्रपुष्करं गया विमुक्ता बदरी वटेश्वरः ।
केदार-पम्पासरसश्च नैमिषं कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ ७॥

शङ्खश्च दूर्वासित-पत्र-चामरं मणि प्रदीपो वररत्नकाञ्चनम् ।
सम्पूर्णकुम्भः सुहृतो हुताशनः कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ ८॥

प्रयाणकाले यदि वा सुमङ्गले प्रभातकाले च नृपाभिषेचने ।
धर्मार्थकामाय जयाय भाषित व्यासेन कुर्यात्तु मनोरथं हि तत् ॥ ९॥

इति व्यासकृतं मङ्गलस्तोत्रं समाप्तम् ।

मनोरथाष्टकम्

सीता राम विवाह पंचमी

श्री सीता राम विवाह पंचमी
सीता सुकुमारी – अवध बिहारी, 
आज बंधे इक डोर से।
हर्षित नर नारी, सृष्टि सारी, 
होते भाव विभोर से।।

स्वयंवर को आए रघुराई,
सहज भाव लिऐ धनुष उठाई।
प्रेम पथ के आरोहण को 
खींचे डोर फिर ज्यारोपण को।।

खींचत ही जब शिव धनु टूटा,
विदेह राज का संताप भी छूटा।
दमक उठी उस पल यूं दामिनी,
भूमि पर हो आ गई चांदनी।।

परशुराम तत्क्षण जा पहुंचे,
धनु तोड़न का कारण पूछे।
ज्ञात हुई जो सारी कहानी,
दिए आशीष मुनि बड़ ज्ञानी।

नेह रंग में रंगी वैदेही, 
करे परिहास सखी सनेही।
नारायणी भी श्रीनिधि होके, 
हिय के भाव हिय में रोके।।

प्रभु जी श्यामल श्यामल सोहे, 
जनकसुता के मन को मोहे।
जयतु जयतु जय मातु जानकी, 
अतिशय प्रिय करूणानिधान की।।

मंगल सी यह बेला पावन,
जनकपुर को अति मनभावन।
स्वयं प्रभु जो बने जमाई, 
संग सिया के ब्याह रचाई।।

जन जन का यूं हृदय था हर्षा,
होने लगी पुष्पों की वर्षा।
नयन कमल भी मोती लुटायें,
लोग नगर के नाचे गायें।।

क्या ही वर्णन आज करूं,
प्रभु मैं परिणय रास का,
उत्सव प्रीत पुनीत का,
यह अटूट प्रेम आभास का।

– अमित पाठक शाकद्वीपी

Tuesday, November 25, 2025

अमित पाठक शाकद्वीपी उपमा अलंकार

जिसकी उपमा होती नहीं, 
जो है असीम अथाह, 
उसी अनंत अर्णव सरिस ही 
अपना भी रहा प्रवाह।

थोड़े से में मन न माने, 
अपनी अनुपम चाह,
कम से बेहतर कुछ न मिले तो, 
बेहतर हो निर्वाह।।

शाकद्वीपी सूर्य अंश से, 
उदयमान यह सृष्टि, 
सूरज सा ही तेज प्रबल है, 
देख मिला कर दृष्टि।

अपने तम से खुद जल बैठा, 
स्वयं स्वयं की ऋष्टि,
मन की वह्नि को शिथिल जो कर दे, 
ढूंढूं ऐसी वृष्टि।

– अमित पाठक शाकद्वीपी 

Thursday, November 20, 2025

सपनों का वह गांव सुहाना

सपनों का वह गांव सुहाना, 
जहां रहते थे नानी नाना।
होता था कभी आना जाना,
गर्मी छुट्टी में समय बिताना।।

चारपाई एक द्वार पड़ी थी,
नाना की साइकिल खड़ी थी।
बाहर आम का सुंदर उपवन,
खेतों में खलिहान सुहावन।।

हर पल मस्ती, रहते थे हँसते,
कच्चे घर के वो पक्के रिश्ते।
गुड़ की महक से हवा भी महके,
बुलबुल, मोर, कोयलिया चहके।।

पगडंडी से आते जाते,
मिट्टी से थे तन को सजाते।
पीते थे मटके का पानी,
क्या ही पल ये यार सुहानी।।

अब तो ये समय जा बदला,
बदल गई कहानी।
नानी नाना दोनों गुजरे,
गुजरी याद पुरानी।।

गांव बन कर शहर जा उभरा, 
पक्के छत अब, खोया खपरा।
पक्की सड़के घर को छूती,
मॉल गया बन घर के पिछोती।।

गांव गांव अब शहर से बढ़कर,
सबके घर पे बिजली, मोटर।
सबके ठौर ठिकाने बदले,
जब से नए जमाने बदले।।

अब तो नदियों पर भी दिखते नहीं हैं नाव।
लगता है कि खो सा गया है सपनो वाला गांव।।

– अमित पाठक शाकद्वीपी 


Wednesday, November 19, 2025

सुहानी सुबह


उदित हुए जब देव दिवाकर,
छट से गए सब तिमिर निशाचर।
ओस पर्ण के वाष्पित हो गए,
ज्यों आई ये किरण धरा पर।।

हमने भी तब आलस त्यागे,
फिरने लगे सब भागे भागे।
सबके तन में फुर्ती जागी,
दुनिया सारी काम में लागी।।

देख गगन की सुंदर आभा,
पक्षी गण का शोर शराबा।
सुहानी सुबह की ताजी हवाएं,
हरे भरे उपवन महकाए।।

हाथ लिए मैं चाय की प्याली,
देखूं ये अद्भुत हरियाली।
कुदरत के नैसर्गिक सुख को,
रचना में मैंने लिख डाली।।

उड़े गगन में खग अनुरागी,
तकती जाऊं बस मैं वैरागी।
खुद को खुद ही डांट लगाऊं,
पहले क्यों न इस पल जागी,

प्रभु की सुंदर सृष्टि देखूं 
मन ही मन मुस्काऊं 
देख देख मैं सुबह सुहानी,
फुले नहीं समाऊं।।
       – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Wednesday, October 29, 2025

कहा रहती है सारी नदियां और तीर्थ

तत्रैव गंगा यमुना च त्रिवेणी, गोदावरी सिंधु सरस्वती च।
सर्वाणि तीर्थानि वसन्ति तत्र, यत्राच्युतोदारकथाप्रसङ्गः॥

Thursday, August 21, 2025

स्त्री का मन

स्त्री का मन 
तुम क्या जानो स्त्री के मन को,
कैसी इसकी चाह?
वेग प्रबल कोई धार नदी की,
ऐसी यह अमित अथाह।।

मन की पीड़ा मन में रखती,
होठों पर उत्साह,
नारी मन को जान सके न,
परम पिता ब्रह्मा।।

पीकर भेद भाव के विष को,
जलती अंतर्दाह,
सुख में दुख में तुझ संग होती,
देती सदा सलाह।।

कभी क्रोध में बने कालिका,
सब कुछ करें तबाह,
कभी प्रीत के रस में कर लें,
सारा जीवन निर्वाह।।

स्नेह करें तो सब सुख त्यागे,
तुझे दिखाए राह,
नारी जग की अनुपम सृष्टि,
अद्भुत रचना वाह।।

– अमित पाठक शाकद्वीपी 


Friday, July 25, 2025

कपाली शिव शंकर

डडम डम डडम डडम डम डडम
डडम डम डडम डम डम डम 
हर हर शंकर हरते तम 
डडम डम डडम डडम डम डडम
डडम डम डडम डम डम डम
 
जय गिरिजापति दीन दयाला,
हाथ पिनाक भुजंग की माला।
शशि शीतल मस्तक पर सोहे,
भस्म रमा तन मन को मोहे।।

गौर वर्ण और छवि निराली,
जय भूतेश्वर जय हो कपाली।
डम डम डमरू ध्वनि सुनाए,
नाद नाद प्रभु महिमा गाए।।

अखिल विश्व के नायक तुम हो,
दुःख नाशक सुख दायक तुम हो।
तांडव तेरा नृत्य मन भावन,
धन्य धरा को करते पावन।।

दमन किए शत्रुन् के दल को,
वेद बखाने तुम्हरे बल को।
हरि चिंतन में खोए रहते,
राम राम अंतर्मन में कहते।।

सारे जग तारक तुम हो,
पालक हरि संहारक तुम हो।
सृष्टि रथ की डोर सम्हाले,
अद्भुत हो बाघाम्बर वाले।।
          – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Monday, July 21, 2025

शिव ध्यान

कण्ठे यस्य विराजते हि गरलं शीर्षे च मन्दाकिनी
वामाङ्गे गिरिजाननं कटितटे शार्दूल चर्माम्बरम्।।
माया यस्य रुणद्धि विश्वमखिलं तस्मै नमः शम्भवे
जम्बुवज्जल विन्दुवज्जल जव ज्जम्  बालव ज्जालवत्।।

कण्ठे यस्य विराजते हि गरलं , गंगाजलम् मस्तके ।
वामांगे गिरिराज राजतनया जाया भवानी स्थिता: ।।
नन्दी स्कन्द गणाधिनाथ सहित: केदारनाथ प्रभो ।
केदारांचल संस्थिता हि सतत् कुर्यात सदा मङ्गलम् ।।


Thursday, July 17, 2025

प्रेम पथिक की अभिलाषा –(स्वर्णिम दर्पण में प्रकाशित)

थी प्रेम पथिक की ये आशा 
कि फिर उनका दीदार हो
हो खड़े आमने सामने 
बाते भी दो चार हो

बीती बातें याद कर 
मुस्कुराएं हम दोनों
कुछ नया नवेला गढ़ने को
भी दोनो तैयार हो

थी प्रेम पथिक की अभिलाषा
कि फिर उनका दीदार हो

किस्मत का भी हो रुख
हमारे पक्ष में
सितारों की मेहरबानी से
खुशियों की बौछार हो 

थी प्रेम पथिक की अभिलाषा
कि फिर उनका दीदार हो

थामने को हाथ उनका 
ख्वाहिश कब से लिए बैठा हूं
दिल की ऐसी भी तमन्ना
पूरी इस बार हो
थी प्रेम पथिक की अभिलाषा
कि फिर उनका दीदार हो

– अमित पाठक शाकद्वीपी 

महाकाल मतवाला

सिर पे जटा और अंग विभूति,
शीश शशि अरु भांग की बूटी,
नेत्र धधकती ज्वाला,
वो महाकाल मतवाला।।

आन पड़ी जब विश्व पे संकट,
याद करें उन्हें देव दनुज नर,
तब पीए हलाहल प्याला,
वो महादेव मतवाला।।

पार्वती के संग विराजे,
हाथ डमरू पिनाक है साजे,
तन बाघाम्बर छाला,
वो आदिगुरु मतवाला।।

भूतन संग वो डेरा डाले,
डोर जगत की रहें संभाले,
रखें अद्भुत रूप निराला,
वो आदियोगी मतवाला।।

ध्यान धरूं बस महिमा गाऊँ,
पल पल प्रति पल शीश नवाऊँ,
कष्ट हरे जो सारा, 
देव वो भोला भाला।।

हर हर महादेव 

– अमित पाठक शाकद्वीपी 

आशाओं के अंकुर

कागा जैसा रूप मिला,  और वाणी जैसे दादुर। पर अपनी मस्ती में  रहते वीर बहादुर।। इक इक कर सब साथ छूट गए, होते गये सभी दूर। अनगिनत च...