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Monday, April 6, 2026

शकुंतला दुष्यंत


कितना बेहतर जीवन था, दिन थे कितने गुलजार।
उपवन बीच बसेरा अपना, पुष्पों की थी सजी बहार।।
आए एकदिन राजकुंवर फिर करने को था रहा शिकार।
यहां वहां पशुअन के पीछे ले धनुष बाण तैयार।।

कोशिश कर के मृग को साधा, मूक प्राणी वह बड़ा लाचार।
फिर भी नृप को दया न आई कर डाला उसने प्रहार।।
तत्क्ष्ण आ पहुंची शकुंतला, वन देवी सा रहा श्रृंगार।
मोहित हो गए राजकुंवर तब जब देखा ऐसा व्यवहार।।

बात बात में परिचय जाना, जाना मात पिता का नाम।
इतनी सुंदर कन्या का भला क्या वन में काम ?
कहती कन्या कि वास यहीं है यहीं हमारा धाम।
पशु पक्षी के इस उपवन में आता हमें भी खूब आराम।।

तभी कुंवर ने ब्याह की उनसे कर दी बात।
दोनों ने संग दिवस बिताया बीती सुखमय रात।।
एक दिन का बस प्रेम जाता कर राजा नगर को लौटे।
रही शकुंतला राहें तकती वादे सब निकले झूठे।।

दिवस दिवस तक भूखी रहती, जाग बिताए रैन।
दुष्यंत के याद में पल पल रोते रहते नैन।।
दिन भी बीता माह बीत गए लेकिन प्रिय न आएं।
विरह अग्नि में तपती कन्या ने ऐसे थे सुत जाए।।

भरत जन्म पर उत्सव सा था, मिलने लगी बधाई।
लेकिन अब तक भी दुष्यंत को न याद शकुंतला आई।।
वर्षों बाद जब पुनः थे राजा वन को आए। 
देख भरत को शावक के संग नृप बड़े घबराए।।

पूछा कौन हो, क्या है परिचय, यहां कहां रहते हो?
बड़े भयावह इस उपवन में पीड़ा क्यों सहते हो।।
पीड़ा की यहां बात नहीं है, ये निज धाम हमारा।
चलिए चल कर देख लीजिए होता है कैसे है गुजारा।।

गए पुनः जब आश्रम में तभी भ्रांति टूटी।
जाग उठी तब हाय री किस्मत जो बरसों से थी फूटी।।
शकुंतला को दुष्यंत को फिर से मिला सहारा।
भरत को भी राज गृह का मिला इशारा।।

उपवन सा ही महका रिश्ता रोशन हुई गृहस्थी।
तब से अब तक भारत भू की भरत नाम से हस्ती।।

– अमित पाठक शाकद्वीपी 

Tuesday, February 17, 2026

व्याकुल सी जब राधिके


व्याकुल सी जब राधिके चाहे कुछ आराम, 
सेज नहीं, न आसन भाये, चाहे केवल श्याम।
कांधे पर जब शीश धरे, तब मन को हो विश्राम,
प्रीत मीत के गीत सुनाए, भूले सारा काम।।

गोप ग्वाल से दूर कहीं जब कान्हा वन को जाए,
पद चिन्हों को तकती राधा पीछे पीछे आए।
निर्जन से उस कानन में फिर लता पत्र मुस्काऐं, 
हैं प्रेम से साक्षी सारे मन ही मन हर्षाऐं।।

दिनकर भी वह रूप निहारे, खुद भी खूब लजाये,
नेह मिलन में हो न बाधक, सो बस ढलता जाये।
वृक्ष, डाल, ये पत्र पुष्प सब, प्रेम मग्न हो डोले,
प्रेम अगन में जलते मन में शीतलता भी घोले।।
 
– अमित पाठक शाकद्वीपी 

Tuesday, December 16, 2025

प्रेमानुभूति


श्री राधे में खो गए मोहन कुंज बिहारी, 
ज्यों है देखो प्रेम मग्न उनकी राधा प्यारी।
अद्भुत शोभा है तन मन की लीला कितनी न्यारी,
राधा के रंग रंग से गए हैं माधव कृष्ण मुरारी।।

प्रेममयी भाव भंगिमा, दिव्य मृदुल मुस्कान,
हाथ लिए एक वेणु से प्रभु जी छेड़े तान।
चंद्र सरिस श्री राधिका मेघ सरिस भगवान,
एक दूजे में रमे हुए हैं, एक दूजे के प्राण।।

कानो में कुंडल झलकाया, मस्तक पर है चंदन,
एक टक नैना देखें तुझको मौन भाव से वंदन।
राधिका के तन पर भी ये दिव्य वस्त्र आगराए,
पाकर स्पर्श हवा के ये कुंतल नागिन सी बलखाए।।

हरी हरी ये चूड़ियां हरि में खोती जाए,
जब जब श्याम निहारे इनको राधे भी हर्षाए,
मांग टिका भी स्वर्णिम और बिंदी सजी लीलार, 
दिव्य प्रीत की अनुभूति अनुपम इनका प्यार।

अमित तेरी ये लेखनी चाहे जितना चाहे,
किंतु अलौकिक प्रेम को शब्दों में कैसे सजाए।
मैं मतिहीन लिखूं वही, जितना मुझको आए,
क्षमा करना श्री राधिके, कोई चूक अगर हो जाए।
                  – अमित पाठक शाकद्वीपी 


Saturday, December 13, 2025

संस्मरण

क्या बताऊं कहां से शुरुआत करूं, कुछ समझ नहीं आ रहा। यादें इतनी सारी हैं कि एक संस्मरण में उसे समाहित कर पाना ही मुश्किल है। स्कूल में गुजारे यूं तो सारे ही दिन बड़े अच्छे और यादगार गुजरे थे फिर भी एक किस्सा आप सभी के साथ साझा करता हूँ। हमारी आठवी कक्षा की बोर्ड की परीक्षा चल रही थी और उन दिनों हम बड़े मस्ती भी किया करते थे। पूरी कक्षा ने मिल कर एक प्लान बनाया कि सब मिल कर एक दूसरी की मदद करेंगे। पहले दिन की परीक्षा आरंभ हुई और अपनी कक्षा में एक बड़े सौम्य से शिक्षक आए जिन्होंने हमें खुली छूट दे दी थी। ऐसा मौका भला कौन छोड़े हमने भी जमकर चिटिंग की, एक दूसरे से खुल कर पूछताछ यहां तक की कॉपियां भी बदल ली थी। बड़ा मज़ा आया खुशी खुशी उस दिन की परीक्षा खत्म कर के घर वापस आ गए। अगले दिन जब दूसरे दिन की परीक्षा के लिए हमने कमरे में कदम ही रखा था तो गज़ब कांड हुआ पड़ा था। पिछले दिन की घटना का सारा विवरण जब प्राचार्य महोदय के पास गया तो परिणाम ये हो गया कि कमरे की सारी कुर्सियाँ मेज सब बाहर कर दिए गए और दरियां बिछा दी गई। आदेश ये हुआ की अब पूरी परीक्षा इन पर बैठ कर ही देनी है। सारा प्लान फेल हो गया हमारा।
गुरु जी के आगे हमारी एक न चली। हम सब पास तो हो गए पर पूरी कक्षा विद्यालय में सबके नजरों में आ गई। 
                      – अमित पाठक शाकद्वीपी 


Thursday, December 11, 2025

जलने लगा अलाव

जलने लगा अलाव 
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अमित कोई अब मीत नहीं है 
बदले सबके स्वभाव,
कुछ वाणी कुछ कर्मों से 
देते हैं हर पल घाव।

न साथी, न हित हितैषी, 
झूठा सबका बर्ताव,
हाय बर्फ सी जमीं ख्वाहिशें, 
चलता न कोई दांव।

व्याकुल मन के इस ठिठुरन से, 
करने को स्वयं बचाव।
जला दिया तब अरमानों को,
ज्यों हो जलने लगा अलाव,

सपने सारे जब राख हुए तब, 
मिला कहीं ठहराव।
वरना उम्मीदों के बोझ से, 
थकने लगे थे पांव।

जब जब खुशियां खोने लगे 
और दुःख का होता फैलाव,
ऐसे पल में रहो अकेले, 
होता बेहतर अलगाव।

द्वेष लहर से कहीं है बेहतर,
शीत लहर प्रभाव,
ढाल सरिस ही मिल जाते हैं,
जगह जगह अलाव।

पर द्वेष से जलते तन को,
केवल मिला तनाव,
भटके इस दर से उस दर तक,
कहीं नहीं पड़ाव।
            – अमित पाठक शाकद्वीपी 



Wednesday, December 10, 2025

नव प्रभात

क्या वर्णन करूं मैं 
उस दिव्य प्रकाश का, 
जिसने रास्ता दिखा दिया 
तिमिर को संन्यास का।

क्या अद्भुत दृश्य था 
उस पल आकाश का,
आगमन जब हुआ 
नव प्रभात में उजास का।

धारण किया था गगन ने 
कुछ लाल लिबास सा, 
सुशोभित था वर्णक्रम भी 
ज्यों अनुप्रास सा।

उस प्रभा के तेज पुंज में 
कुछ तो था खास सा, 
मैं देखता गया एकटक 
मानो बदहवास सा।।

– अमित पाठक शाकद्वीपी 

Tuesday, December 9, 2025

बड़ी बहु


कल कहीं दूर देश से 
आए थें कुछ सज्जन,
देख उनको अपने गृह में, 
हर्षित हो उठा था ये मन। 

बड़ी बहु ने स्वागत सहित जब, 
कराया उनको भोजन,
तरह तरह के भोग बने थे, 
तरह तरह के व्यंजन।

हाय कचौरी हाय जलेबी, 
पूरी सब्जी खीर,
महक से उनके घर भर जाता, 
होता था मन ये अधीर।

लेते ही फिर प्रथम निवाला, 
स्वाद ने यूं जादू कर डाला,
वाह वाह की ध्वनि सुनाई,
किसने यह आहार बनाई।

बड़ी बहु की उस मेहनत का 
होने लगा बखान,
हाथों में क्या दिव्य स्वाद है 
होता था आह्वान।

बूढ़े चाचा ने बात बताई,
निकाली एक पोटली छुपाई,
रखी कहीं जो पाई पाई
देने को थे आगे बढ़ाई।

कुछ पैसे वो नेग लगाकर 
देने लगे न्यौछावर,
अन्नपूर्णा है बहु हमारी 
देते सब आशीष मनोहर।

उस दिन बड़ी बहु को
मिला था उसका मान,
बाकी दिन के सब कामों 
कहां किसी को ध्यान।

चूल्हे की वह लौ में तपती,
दिन भर खटती, चुप सब सहती।
घरवाले फरमाइश करके करते बस परेशान,
क्या कैसे किस हाल में है नहीं किसी को भान।

शौक छोड़ वो लगी पड़ी है,
सदस्यों के पालन पोषण में,
खुद की आभा खोती गई है, 
सबकी ज्योति के रोशन में।

अब भी गर न त्याग को समझा,
जाना नहीं समर्पण,
नारी खुद से कुछ न कहेगी,
मौन है उसका गर्जन।

कुछ करनी उसकी सेवा का 
उसको कोई मान तो दो,
केवल वो क्यों ध्यान धरे फिर,
तुम भी उस पर ध्यान तो दो।

कल सुबह जब भोजन पर बैठो,
तो उनकी करो बड़ाई,
रोग कष्ट सब भूल के जिसने,
थाली तेरी सजाई।

– अमित पाठक शाकद्वीपी 



शकुंतला दुष्यंत

कितना बेहतर जीवन था, दिन थे कितने गुलजार। उपवन बीच बसेरा अपना, पुष्पों की थी सजी बहार।। आए एकदिन राजकुंवर फिर करने को था रहा शिक...