क्या बताऊं कहां से शुरुआत करूं, कुछ समझ नहीं आ रहा। यादें इतनी सारी हैं कि एक संस्मरण में उसे समाहित कर पाना ही मुश्किल है। स्कूल में गुजारे यूं तो सारे ही दिन बड़े अच्छे और यादगार गुजरे थे फिर भी एक किस्सा आप सभी के साथ साझा करता हूँ। हमारी आठवी कक्षा की बोर्ड की परीक्षा चल रही थी और उन दिनों हम बड़े मस्ती भी किया करते थे। पूरी कक्षा ने मिल कर एक प्लान बनाया कि सब मिल कर एक दूसरी की मदद करेंगे। पहले दिन की परीक्षा आरंभ हुई और अपनी कक्षा में एक बड़े सौम्य से शिक्षक आए जिन्होंने हमें खुली छूट दे दी थी। ऐसा मौका भला कौन छोड़े हमने भी जमकर चिटिंग की, एक दूसरे से खुल कर पूछताछ यहां तक की कॉपियां भी बदल ली थी। बड़ा मज़ा आया खुशी खुशी उस दिन की परीक्षा खत्म कर के घर वापस आ गए। अगले दिन जब दूसरे दिन की परीक्षा के लिए हमने कमरे में कदम ही रखा था तो गज़ब कांड हुआ पड़ा था। पिछले दिन की घटना का सारा विवरण जब प्राचार्य महोदय के पास गया तो परिणाम ये हो गया कि कमरे की सारी कुर्सियाँ मेज सब बाहर कर दिए गए और दरियां बिछा दी गई। आदेश ये हुआ की अब पूरी परीक्षा इन पर बैठ कर ही देनी है। सारा प्लान फेल हो गया हमारा।
गुरु जी के आगे हमारी एक न चली। हम सब पास तो हो गए पर पूरी कक्षा विद्यालय में सबके नजरों में आ गई।
– अमित पाठक शाकद्वीपी
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