सर्वाणि तीर्थानि वसन्ति तत्र, यत्राच्युतोदारकथाप्रसङ्गः॥
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Wednesday, October 29, 2025
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आशाओं के अंकुर
कागा जैसा रूप मिला, और वाणी जैसे दादुर। पर अपनी मस्ती में रहते वीर बहादुर।। इक इक कर सब साथ छूट गए, होते गये सभी दूर। अनगिनत च...
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अप्रैल 2022, उन दिनों में मैं योर कोट नाम के एक ऐप पर छोटी-छोटी रचनाएं लिखा करता था। छोटी-छोटी मुक्तक लिखने के लिए यह एक अच्छा स...
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प्रेम पथिक की अभिलाषा का क्यों ऐसा उपहास किया, बार बार छलने को ही बस प्रयास किया। अनसुना कर गए बात और वादा भी कहां साकार है, निर्लज...
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हूँ कौन और किस लिए धरा पर, उस ईश्वर ने मुझे उतारा है। उसकी मर्जी वो ही जाने, सब उसका ही इशारा है।। नाम समान ही अमित अथाह मैं, उ...