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Friday, September 30, 2022

दुर्गा स्तुति स्वरचित

कब आएंगी माँ भवन हमारे ,
आतुर मन से राह निहारें ।

रूप देवी का कितना प्यारा ,
महिमा विदित सकल संसारा ।

माँ के कितने रूप निराले,
रोग  कष्ट सब हरने वाले।

कैसे भक्ति करू कल्याणी ,
किस विधि करूं अरज भवानी।

मैं मूरख नादान पुजारी,
जानू न भेद विधान तुम्हारी।

जन जन के कल्याण हो करती,
हर लो मैया जी कष्ट हमारी।

दरश दिखा कर  कृपा करदो,
सुख समृद्धि से जीवन भरदो।

आएंगे तेरे धाम को माता ,
पूजेंगे मूरत हे भक्त जन त्राता ।

तूने सबकी विपदा टारि,
कब आएं मुझ दीन की बारी।

आठों प्रहर बस देवी गुण गाऊं ,
देवी चरण में शीश नवाऊं।

करूं आरती मात तुम्हारी,
करना क्षमा तुम भूल हमारी।

मंदिर मंदिर तेरे पाव पखारे,
जिह्वा बस तेरा नाम उच्चारे ।

कब आएंगी माँ भवन हमारे,
आतुर मन से राह निहारें ।
                 - स्वरचित अमित पाठक शाकद्वीपी


Wednesday, September 14, 2022

हिंदी दिवस विशेष

मनाते हैं दिवस हिंदी का
बच्चे कॉन्वेंट में पढ़ाते हैं
कुछ लोग मेरे देश में 
चरित्र दोहरा दर्शाते हैं

उन्हें न रास आती है
सभ्यता संस्कृति अपनी
पश्चिमी देशों के रंग में रंग कर
ख़ुद को सिविलाइज्ड बताते हैं

बोली जाती नहीं हिन्दी 
तत्सम रूप में जिनसे
बड़े गुमान में कुछ लोग
अंग्रेजी में बतियाते हैं

जिन्हें परहेज है साड़ी से
जींस पहन कर इतराती है
दिवस हिंदी का जो आया तो
वो भी हिंदी प्रेम का झूठा व्यतित्व दिखाती है

मायने मातृ भाषा की 
घट रही इतनी
ए बी सी डी याद रहती है
क ख ग घ भूली जाती है

मना जो रहे हो तुम 
आज दिवस मेरा
देख कर ये दिखावा भी
हिन्दी बड़ा शर्माती है
      – अमित पाठक शाकद्वीपी 
            स्वरचित मौलिक रचना 



Sunday, September 4, 2022

हे गुरुवर शत शत वंदन

हे गुरुवर शत शत वंदन
हे गुरुवर शत शत वंदन
ज्ञान का दीप जलाकर आपने
किया अज्ञान तिमिर खंडन

हे गुरुवर शत शत वंदन
हे गुरुवर शत शत वंदन

भेद बताया सही गलत का
राह दिखाते हैं मंजिल का
देवो से बढ़कर उपमा है
कहता है ये अंतर्मन

हे गुरुवर शत शत वंदन
हे गुरुवर शत शत वंदन

सारी पृथ्वी कागज कर दूं
सारे वृक्ष की लेखनी कर दूं
स्याही कर दूं सारे सागर
महिमा का फिर भी हो ना वर्णन 

हे गुरुवर शत शत वंदन
हे गुरुवर शत शत वंदन

मृदुभाषी स्वभाव सरल है
सादा जीवन प्रेम का मन 
मुख से बहती ज्ञान की गंगा
उन चरणों को कोटि नमन 

हे गुरुवर शत शत वंदन
हे गुरुवर शत शत वंदन

      – स्वरचित अमित पाठक शाकद्वीपी
         फुसरो, बोकारो, झारखण्ड 


शकुंतला दुष्यंत

कितना बेहतर जीवन था, दिन थे कितने गुलजार। उपवन बीच बसेरा अपना, पुष्पों की थी सजी बहार।। आए एकदिन राजकुंवर फिर करने को था रहा शिक...