श्री सीता राम विवाह पंचमी
सीता सुकुमारी – अवध बिहारी,
आज बंधे इक डोर से।
हर्षित नर नारी, सृष्टि सारी,
होते भाव विभोर से।।
स्वयंवर को आए रघुराई,
सहज भाव लिऐ धनुष उठाई।
प्रेम पथ के आरोहण को
खींचे डोर फिर ज्यारोपण को।।
खींचत ही जब शिव धनु टूटा,
विदेह राज का संताप भी छूटा।
दमक उठी उस पल यूं दामिनी,
भूमि पर हो आ गई चांदनी।।
परशुराम तत्क्षण जा पहुंचे,
धनु तोड़न का कारण पूछे।
ज्ञात हुई जो सारी कहानी,
दिए आशीष मुनि बड़ ज्ञानी।
नेह रंग में रंगी वैदेही,
करे परिहास सखी सनेही।
नारायणी भी श्रीनिधि होके,
हिय के भाव हिय में रोके।।
प्रभु जी श्यामल श्यामल सोहे,
जनकसुता के मन को मोहे।
जयतु जयतु जय मातु जानकी,
अतिशय प्रिय करूणानिधान की।।
मंगल सी यह बेला पावन,
जनकपुर को अति मनभावन।
स्वयं प्रभु जो बने जमाई,
संग सिया के ब्याह रचाई।।
जन जन का यूं हृदय था हर्षा,
होने लगी पुष्पों की वर्षा।
नयन कमल भी मोती लुटायें,
लोग नगर के नाचे गायें।।
क्या ही वर्णन आज करूं,
प्रभु मैं परिणय रास का,
उत्सव प्रीत पुनीत का,
यह अटूट प्रेम आभास का।
– अमित पाठक शाकद्वीपी
No comments:
Post a Comment