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Tuesday, February 17, 2026

व्याकुल सी जब राधिके


व्याकुल सी जब राधिके चाहे कुछ आराम, 
सेज नहीं, न आसन भाये, चाहे केवल श्याम।
कांधे पर जब शीश धरे, तब मन को हो विश्राम,
प्रीत मीत के गीत सुनाए, भूले सारा काम।।

गोप ग्वाल से दूर कहीं जब कान्हा वन को जाए,
पद चिन्हों को तकती राधा पीछे पीछे आए।
निर्जन से उस कानन में फिर लता पत्र मुस्काऐं, 
हैं प्रेम से साक्षी सारे मन ही मन हर्षाऐं।।

दिनकर भी वह रूप निहारे, खुद भी खूब लजाये,
नेह मिलन में हो न बाधक, सो बस ढलता जाये।
वृक्ष, डाल, ये पत्र पुष्प सब, प्रेम मग्न हो डोले,
प्रेम अगन में जलते मन में शीतलता भी घोले।।
 
– अमित पाठक शाकद्वीपी 

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