और वाणी जैसे दादुर।
फिर अपनी मस्ती में
रहते वीर बहादुर।।
इक इक कर सब साथ छूट गए,
होते गये सभी दूर।
अनगिनत चोटों से सारे
घाव हुए थे नासूर।।
पल पल सबने तानें मारे,
रही नियति निष्ठुर।
फिर भी नहीं किस्मत को कोसा,
डटे रहने को आतुर।।
खुद से खुद को खूब तराशा,
तोड़ी वेदना भंगुर।
हर क्षण दृढ़ विश्वास से बोते
आशाओं के अंकुर।।
– अमित पाठक शाकद्वीपी
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