कितना बेहतर जीवन था, दिन थे कितने गुलजार।
उपवन बीच बसेरा अपना, पुष्पों की थी सजी बहार।।
आए एकदिन राजकुंवर फिर करने को था रहा शिकार।
यहां वहां पशुअन के पीछे ले धनुष बाण तैयार।।
कोशिश कर के मृग को साधा, मूक प्राणी वह बड़ा लाचार।
फिर भी नृप को दया न आई कर डाला उसने प्रहार।।
तत्क्ष्ण आ पहुंची शकुंतला, वन देवी सा रहा श्रृंगार।
मोहित हो गए राजकुंवर तब जब देखा ऐसा व्यवहार।।
बात बात में परिचय जाना, जाना मात पिता का नाम।
इतनी सुंदर कन्या का भला क्या वन में काम ?
कहती कन्या कि वास यहीं है यहीं हमारा धाम।
पशु पक्षी के इस उपवन में आता हमें भी खूब आराम।।
तभी कुंवर ने ब्याह की उनसे कर दी बात।
दोनों ने संग दिवस बिताया बीती सुखमय रात।।
एक दिन का बस प्रेम जाता कर राजा नगर को लौटे।
रही शकुंतला राहें तकती वादे सब निकले झूठे।।
दिवस दिवस तक भूखी रहती, जाग बिताए रैन।
दुष्यंत के याद में पल पल रोते रहते नैन।।
दिन भी बीता माह बीत गए लेकिन प्रिय न आएं।
विरह अग्नि में तपती कन्या ने ऐसे थे सुत जाए।।
भरत जन्म पर उत्सव सा था, मिलने लगी बधाई।
लेकिन अब तक भी दुष्यंत को न याद शकुंतला आई।।
वर्षों बाद जब पुनः थे राजा वन को आए।
देख भरत को शावक के संग नृप बड़े घबराए।।
पूछा कौन हो, क्या है परिचय, यहां कहां रहते हो?
बड़े भयावह इस उपवन में पीड़ा क्यों सहते हो।।
पीड़ा की यहां बात नहीं है, ये निज धाम हमारा।
चलिए चल कर देख लीजिए होता है कैसे है गुजारा।।
गए पुनः जब आश्रम में तभी भ्रांति टूटी।
जाग उठी तब हाय री किस्मत जो बरसों से थी फूटी।।
शकुंतला को दुष्यंत को फिर से मिला सहारा।
भरत को भी राज गृह का मिला इशारा।।
उपवन सा ही महका रिश्ता रोशन हुई गृहस्थी।
तब से अब तक भारत भू की भरत नाम से हस्ती।।
– अमित पाठक शाकद्वीपी
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