प्रेम पथिक की अभिलाषा का क्यों ऐसा उपहास किया,
बार बार छलने को ही बस प्रयास किया।
अनसुना कर गए बात और वादा भी कहां साकार है,
निर्लज्ज तुझको लाज न आई, तुझपे तो धिक्कार है।।
स्वांग रचा कर चले गए तुम याद मेरी न आई,
प्रेम नहीं बस दिखावा था क्या? समझ नहीं मैं पाई।
मन से खुद को सौंप दिया था, क्या उसका ये उपहार है?
निर्लज्ज तुझको लाज न आई, तुझपे तो धिक्कार है।।
हाय मोम सी रही मैं नाजुक, लोहे सा प्रहार किया,
मन को देकर दुख की ज्वाला जीना यूं दुश्वार किया।
तू झूठा बातें भी झूठी बिलकुल ही मक्कार है,
निर्लज्ज तुझको लाज न आई, तुझपे तो धिक्कार है।।
अब तो मैं न नेह लगाऊं, रहूं अकेली पास न आऊं,
सारी यादें माटी कर दूं, या गंगा में उन्हें बहाऊं।
देखो मेरे पास न आना, ये नारी अब तलवार है,
निर्लज्ज तुझको लाज न आई, तुझपे तो धिक्कार है।।
– अमित पाठक शाकद्वीपी
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