कल कहीं दूर देश से
आए थें कुछ सज्जन,
देख उनको अपने गृह में,
हर्षित हो उठा था ये मन।
बड़ी बहु ने स्वागत सहित जब,
कराया उनको भोजन,
तरह तरह के भोग बने थे,
तरह तरह के व्यंजन।
हाय कचौरी हाय जलेबी,
पूरी सब्जी खीर,
महक से उनके घर भर जाता,
होता था मन ये अधीर।
लेते ही फिर प्रथम निवाला,
स्वाद ने यूं जादू कर डाला,
वाह वाह की ध्वनि सुनाई,
किसने यह आहार बनाई।
बड़ी बहु की उस मेहनत का
होने लगा बखान,
हाथों में क्या दिव्य स्वाद है
होता था आह्वान।
बूढ़े चाचा ने बात बताई,
निकाली एक पोटली छुपाई,
रखी कहीं जो पाई पाई
देने को थे आगे बढ़ाई।
कुछ पैसे वो नेग लगाकर
देने लगे न्यौछावर,
अन्नपूर्णा है बहु हमारी
देते सब आशीष मनोहर।
उस दिन बड़ी बहु को
मिला था उसका मान,
बाकी दिन के सब कामों
कहां किसी को ध्यान।
चूल्हे की वह लौ में तपती,
दिन भर खटती, चुप सब सहती।
घरवाले फरमाइश करके करते बस परेशान,
क्या कैसे किस हाल में है नहीं किसी को भान।
शौक छोड़ वो लगी पड़ी है,
सदस्यों के पालन पोषण में,
खुद की आभा खोती गई है,
सबकी ज्योति के रोशन में।
अब भी गर न त्याग को समझा,
जाना नहीं समर्पण,
नारी खुद से कुछ न कहेगी,
मौन है उसका गर्जन।
कुछ करनी उसकी सेवा का
उसको कोई मान तो दो,
केवल वो क्यों ध्यान धरे फिर,
तुम भी उस पर ध्यान तो दो।
कल सुबह जब भोजन पर बैठो,
तो उनकी करो बड़ाई,
रोग कष्ट सब भूल के जिसने,
थाली तेरी सजाई।
– अमित पाठक शाकद्वीपी
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