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Tuesday, November 25, 2025

अमित पाठक शाकद्वीपी उपमा अलंकार

जिसकी उपमा होती नहीं, 
जो है असीम अथाह, 
उसी अनंत अर्णव सरिस ही 
अपना भी रहा प्रवाह।

थोड़े से में मन न माने, 
अपनी अनुपम चाह,
कम से बेहतर कुछ न मिले तो, 
बेहतर हो निर्वाह।।

शाकद्वीपी सूर्य अंश से, 
उदयमान यह सृष्टि, 
सूरज सा ही तेज प्रबल है, 
देख मिला कर दृष्टि।

अपने तम से खुद जल बैठा, 
स्वयं स्वयं की ऋष्टि,
मन की वह्नि को शिथिल जो कर दे, 
ढूंढूं ऐसी वृष्टि।

– अमित पाठक शाकद्वीपी 

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