जहां रहते थे नानी नाना।
होता था कभी आना जाना,
गर्मी छुट्टी में समय बिताना।।
चारपाई एक द्वार पड़ी थी,
नाना की साइकिल खड़ी थी।
बाहर आम का सुंदर उपवन,
खेतों में खलिहान सुहावन।।
हर पल मस्ती, रहते थे हँसते,
कच्चे घर के वो पक्के रिश्ते।
गुड़ की महक से हवा भी महके,
बुलबुल, मोर, कोयलिया चहके।।
पगडंडी से आते जाते,
मिट्टी से थे तन को सजाते।
पीते थे मटके का पानी,
क्या ही पल ये यार सुहानी।।
अब तो ये समय जा बदला,
बदल गई कहानी।
नानी नाना दोनों गुजरे,
गुजरी याद पुरानी।।
गांव बन कर शहर जा उभरा,
पक्के छत अब, खोया खपरा।
पक्की सड़के घर को छूती,
मॉल गया बन घर के पिछोती।।
गांव गांव अब शहर से बढ़कर,
सबके घर पे बिजली, मोटर।
सबके ठौर ठिकाने बदले,
जब से नए जमाने बदले।।
अब तो नदियों पर भी दिखते नहीं हैं नाव।
लगता है कि खो सा गया है सपनो वाला गांव।।
– अमित पाठक शाकद्वीपी
No comments:
Post a Comment