---------------------------------------------
अमित कोई अब मीत नहीं है
बदले सबके स्वभाव,
कुछ वाणी कुछ कर्मों से
देते हैं हर पल घाव।
न साथी, न हित हितैषी,
झूठा सबका बर्ताव,
हाय बर्फ सी जमीं ख्वाहिशें,
चलता न कोई दांव।
व्याकुल मन के इस ठिठुरन से,
करने को स्वयं बचाव।
जला दिया तब अरमानों को,
ज्यों हो जलने लगा अलाव,
सपने सारे जब राख हुए तब,
मिला कहीं ठहराव।
वरना उम्मीदों के बोझ से,
थकने लगे थे पांव।
जब जब खुशियां खोने लगे
और दुःख का होता फैलाव,
ऐसे पल में रहो अकेले,
होता बेहतर अलगाव।
द्वेष लहर से कहीं है बेहतर,
शीत लहर प्रभाव,
ढाल सरिस ही मिल जाते हैं,
जगह जगह अलाव।
पर द्वेष से जलते तन को,
केवल मिला तनाव,
भटके इस दर से उस दर तक,
कहीं नहीं पड़ाव।
– अमित पाठक शाकद्वीपी
No comments:
Post a Comment