उदित हुए जब देव दिवाकर,
छट से गए सब तिमिर निशाचर।
ओस पर्ण के वाष्पित हो गए,
ज्यों आई ये किरण धरा पर।।
हमने भी तब आलस त्यागे,
फिरने लगे सब भागे भागे।
सबके तन में फुर्ती जागी,
दुनिया सारी काम में लागी।।
देख गगन की सुंदर आभा,
पक्षी गण का शोर शराबा।
सुहानी सुबह की ताजी हवाएं,
हरे भरे उपवन महकाए।।
हाथ लिए मैं चाय की प्याली,
देखूं ये अद्भुत हरियाली।
कुदरत के नैसर्गिक सुख को,
रचना में मैंने लिख डाली।।
उड़े गगन में खग अनुरागी,
तकती जाऊं बस मैं वैरागी।
खुद को खुद ही डांट लगाऊं,
पहले क्यों न इस पल जागी,
प्रभु की सुंदर सृष्टि देखूं
मन ही मन मुस्काऊं
देख देख मैं सुबह सुहानी,
फुले नहीं समाऊं।।
– अमित पाठक शाकद्वीपी
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