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Thursday, May 16, 2024

तेरे साथ ये लम्हे प्रिये देखो कितना खास है।

तेरे साथ ये लम्हे 
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इन लम्हों की बात अनोखी, अनोखा सा एहसास है,
तेरे साथ ये लम्हे प्रिये देखो कितना खास है।

हर दिन दिवाली सी जगमग, हर पल में उल्लास है,
तेरे साथ ये लम्हे प्रिये देखो कितना खास है।

तुम जो थामो हाथ हमारा तो चिंताओं से अवकाश है,
तेरे साथ ये लम्हे प्रिये देखो कितना खास है।

जब से मैंने तुमको पाया तुमपे पूरा विश्वास है,
तेरे साथ ये लम्हे प्रिये देखो कितना खास है।

दीप्त हुई है किस्मत तुमसे, तुम्हारा ऐसा प्रकाश है,
तेरे साथ ये लम्हे प्रिये देखो कितना खास है।

© अमित पाठक शाकद्वीपी 


Wednesday, May 15, 2024

कलम और स्याही


कलम और स्याही की ऐसी रही कहानी,
दोनो ने संग संग मानो जीने मरने की ठानी,
एक होकर दोनो ने ऐसा जादू कर डाला,
गढ़ी कई कविता कहानी गीत गज़ल की माला।

बन कर कहीं आयुध, वैरी को धूल चटाया,
वेगवान कोई कलम जब, पत्रकार के हाथ में आया,
कभी कहीं कोई लेखक इसके दम पर था इतराया,
कभी कहीं इसने कितनो को है साक्षर बनाया।

इसके ही गुण से है, कइयों को अभिमान,
कवि ने लिख दी इसी कलम से, गीता–वेद–पुराण,
कहीं बिखेरी गई प्रेम से, तो शब्दों को महकाया,
जबरन कभी कहीं चली तो हाय कष्ट पहुंचाया।

इसके बल से बने या बिगड़े देशों की सरकार,
इसकी तुलना में फीके है पड़ते दो धारी तलवार,
इसी कलम की स्याही से मैने भी सब कुछ पाया,
बना के इसको संगी साथी ह्रदय स्थल में है सजाया।

© अमित पाठक शाकद्वीपी 

Tuesday, May 14, 2024

झुमका तेरा


नील गगन से ह्रदय धरा पर उतरी तुम धीरे मेरे,
नयन नक्श की चुम्बकत्व थे जैसे मुझको घेरे,
नीले रंग के लिबाज़ में नील परी सी लागी,
तेरे नेह के बंधन में बंध कर मेरी किस्मत जागी।

तन मन दोनो की सुंदरता का ऐसा था प्रमाण,
तन तो मेरा मेरे तक था तुझमें बसे थे प्राण,
तेरी पायल तेरा झुमका तेरा रूप श्रृंगार,
देखूं जब जब मैं तुझको सांसे जाऊं हार।

रूप रति सा करके धारण जीवन में तुम आए,
मेरे मन के निर्जन वन में प्रेम के पुष्प खिलाए,
पहली दफा देख के मुझको थे तुम जब मुस्काए,
तब से अब तक घूमूं पल पल मैं तो अब हर्षाए।

बांध अमित को स्नेह के बंधन में ऐसे हुए दीवाने,
अब तो सब कुछ सौंप दिया है तू माने या ना माने।

© अमित पाठक शाकद्वीपी 

Wednesday, May 8, 2024

ये तेरा स्पर्श

ये तेरा स्पर्श पिया जी, 
दिल में मिश्री घोले,
तुमसे मिलकर ह्रदय की धड़कन भी,
अब राग रागिणी बोले।

मेरे मन के एहसासों को,
तू जो विश्वास से तोले,
होकर मन बांवरा कोई मधुकर,
तेरे पीछे पीछे डोले।

दीप्त भाल पर चमके चांदनी,
बिखेरे रौशनी होले होले 
मंद मुस्कान की अनुपम छटा,
मुख मंडल पे संजोले।

तेरा ये स्पर्श पिया जी,
दिल में मिश्री घोले,
तुमसे मिलकर ह्रदय की धड़कन भी,
अब राग रागिणी बोले।

© अमित पाठक शाकद्वीपी 

Tuesday, May 7, 2024

मां

हों मूर्त रुप में देवी तुम, 
शिशु से जो इतना प्यार किया,
हे मातु जगत जननी प्यारी, 
तूने जग का उद्धार किया।

शशि मुख की शोभा है सरल सहज, 
आंचल में लाड दुलार किया,
अपना सुख न देखा कभी,
सबकुछ तो तूने वार दिया।

है ह्रदय कमल में प्रेम बसा,
तूने ही संवारी मेरी दशा,
मां की ममता में सब सुख है,
सब कष्ट टरे गर कभी कहीं फसा।

पद पंकज की धुली चंदन, 
है मात तुम्हारा अभिनंदन,
ज्यों ज्यों कोई संकट रही हम पर,
तो तुम ही बनी थीं दुखभंजन।

अब मातु मुझे बस शक्ति दो,
हर दिन हर पल तेरी भक्ति हो,
भाग्य विधाता बन कर मां,
मेरे संग सदा तेरी हस्ती हो।
© अमित पाठक शाकद्वीपी 

Friday, May 3, 2024

पराधीन

तू करता जा सबके मन का,
और खुश करता रह सभी जन को,
जब अपनी खुशी की बात रहें,
तो मिला कभी अधिकार नहीं।

है परोपकार ही धर्म तेरा,
और पर चिंता का मर्म तेरा,
अपनी चिंता में खोने को,
तु रहा कभी हकदार नहीं।

सब कुछ सौंप दिया प्यारे,
पर फिर भी किसको ऐतबार नहीं,
रोज रोज के ताने सुन,
अब तो जीना स्वीकार नहीं।

अब कुछ भी करूं तो व्यर्थ लगे,
सुन सुन कर करना शर्त कहीं,
है दूरी भली उस व्यक्ति से,
जिसका उचित व्यवहार नहीं।

© अमित पाठक शाकद्वीपी 



Thursday, May 2, 2024

आम का पेड़


आम का वो पेड़ पुराना,
सारा गांव रहा जिसका दिवाना,
बच्चे बूढ़े और जवान,
सबके मुख पर उसका व्याख्यान।

हर किस्से में वर्णन उसका,
बड़ा रसीला फल था जिसका,
आम के वृक्ष की ठंडी छाया,
गांव वालों ने जहां सब सुख पाया।

ग्राम पंचायत का वह डेरा,
उसके दातुन से सबका सवेरा,
फल भी उसका लकड़ियां उसकी,
अद्भुत शोभा हर घर आंगन की।

गुण में पिछे छोड़े सबको,
फल दे देवे इसको उसको,
बाग बगीचे में रौनक जिस से,
गांव की रही पहचान भी उस से।

पेड़ किनारे की वह सड़क पुरानी,
जिस पथ पर सबकी आना जानी,
ठहरे कोई राहगीर कभी जो,
विश्राम का दे अवसर सभी को।

पर्व त्यौहार में पल्लव से उसके,
तोरण द्वार सजे हम सब के,
उसकी महत्ता क्या बतलाऊं,
बस मैं स्मृतियां दोहराऊं।

शहर में न वो पेड़ आम का,
बाग बगीचा बस रहा नाम का,
दातुन भी अब ब्रश बन बैठा,
मानो वृक्ष हम सब से रूठा।

हमने ही उसकी महिमा न मानी,
मूढ़ बुद्धि हम बड़ अज्ञानी,
शहर में खोजे अब छाया उसकी,
काट काट बेची जो काया जिसकी।

घर का सारा उपस्कर सजाया,
उसकी लकड़ी से ही दीवान बनवाया,
उसी की गोद में रात बिताऊं,
आम का पेड़ नहीं तो बस लकड़ियों से अब काम चलाऊं।

@अमित पाठक शाकद्वीपी 

आशाओं के अंकुर

कागा जैसा रूप मिला,  और वाणी जैसे दादुर। पर अपनी मस्ती में  रहते वीर बहादुर।। इक इक कर सब साथ छूट गए, होते गये सभी दूर। अनगिनत च...