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Wednesday, October 5, 2022

व्यथा

न ये कोई लेख है न कोई कहानी। ये एक आप बीती है जो कभी न कभी , कहीं न कहीं हम सबने महसूस किया है। कई बार सफर में हम खुद को बेहद अकेला पाते हैं। कई बार जिनसे उम्मीद की होती है वो उम्मीद पर खरे नहीं उतरते। ऐसे में हम खुद को दिलाशा देते है कि शायद हमने ही ज्यादा की उम्मीद लगा ली थी । कई बार लगता है कि अकेलेपन में जो भावनाएं है मन की उनको किसी से तो साझा करते। किसी को तो बताते अपनी बाते पर कोई होता ही नहीं है जिनसे कुछ कहा जाए। कई बार ऐसा भी लगता है कि हमारी ही बदनसीबी है। उस पल में किसी की याद भी आती है। हम खुद को कमजोर भी महसूस करते है पर जिनकी याद आती है उनसे बात कर पाने की या तो संभावना नहीं रहती या लोग नहीं रहते। उदास अपने मन को खुद से समेट कर फिर से खुद को सबके सामने मजबूत दिखाते हैं। खुद ही खुद में हंसने का दिखावा भी होता है। अपने मन की बात मन के ही किसी कोने में दबा देते हैं।ऐसा सबके साथ होता है। कभी किसी वारदात के बाद हम किसी से चीड़ से जाते है । नापसंद बढ़ सी जाती है । हम उनसे बात करना बंद कर देते हैं। खुल कर कुछ बोलने की चाहत भी नहीं रहती और सब कुछ खुद में ही सोचते और जवाब भी खुद देते हैं। हाँ हम सब ऐसे जीते हैं हाँ हम सब ऐसे जीते हैं ।

Friday, September 30, 2022

दुर्गा स्तुति स्वरचित

कब आएंगी माँ भवन हमारे ,
आतुर मन से राह निहारें ।

रूप देवी का कितना प्यारा ,
महिमा विदित सकल संसारा ।

माँ के कितने रूप निराले,
रोग  कष्ट सब हरने वाले।

कैसे भक्ति करू कल्याणी ,
किस विधि करूं अरज भवानी।

मैं मूरख नादान पुजारी,
जानू न भेद विधान तुम्हारी।

जन जन के कल्याण हो करती,
हर लो मैया जी कष्ट हमारी।

दरश दिखा कर  कृपा करदो,
सुख समृद्धि से जीवन भरदो।

आएंगे तेरे धाम को माता ,
पूजेंगे मूरत हे भक्त जन त्राता ।

तूने सबकी विपदा टारि,
कब आएं मुझ दीन की बारी।

आठों प्रहर बस देवी गुण गाऊं ,
देवी चरण में शीश नवाऊं।

करूं आरती मात तुम्हारी,
करना क्षमा तुम भूल हमारी।

मंदिर मंदिर तेरे पाव पखारे,
जिह्वा बस तेरा नाम उच्चारे ।

कब आएंगी माँ भवन हमारे,
आतुर मन से राह निहारें ।
                 - स्वरचित अमित पाठक शाकद्वीपी


Wednesday, September 14, 2022

हिंदी दिवस विशेष

मनाते हैं दिवस हिंदी का
बच्चे कॉन्वेंट में पढ़ाते हैं
कुछ लोग मेरे देश में 
चरित्र दोहरा दर्शाते हैं

उन्हें न रास आती है
सभ्यता संस्कृति अपनी
पश्चिमी देशों के रंग में रंग कर
ख़ुद को सिविलाइज्ड बताते हैं

बोली जाती नहीं हिन्दी 
तत्सम रूप में जिनसे
बड़े गुमान में कुछ लोग
अंग्रेजी में बतियाते हैं

जिन्हें परहेज है साड़ी से
जींस पहन कर इतराती है
दिवस हिंदी का जो आया तो
वो भी हिंदी प्रेम का झूठा व्यतित्व दिखाती है

मायने मातृ भाषा की 
घट रही इतनी
ए बी सी डी याद रहती है
क ख ग घ भूली जाती है

मना जो रहे हो तुम 
आज दिवस मेरा
देख कर ये दिखावा भी
हिन्दी बड़ा शर्माती है
      – अमित पाठक शाकद्वीपी 
            स्वरचित मौलिक रचना 



Sunday, September 4, 2022

हे गुरुवर शत शत वंदन

हे गुरुवर शत शत वंदन
हे गुरुवर शत शत वंदन
ज्ञान का दीप जलाकर आपने
किया अज्ञान तिमिर खंडन

हे गुरुवर शत शत वंदन
हे गुरुवर शत शत वंदन

भेद बताया सही गलत का
राह दिखाते हैं मंजिल का
देवो से बढ़कर उपमा है
कहता है ये अंतर्मन

हे गुरुवर शत शत वंदन
हे गुरुवर शत शत वंदन

सारी पृथ्वी कागज कर दूं
सारे वृक्ष की लेखनी कर दूं
स्याही कर दूं सारे सागर
महिमा का फिर भी हो ना वर्णन 

हे गुरुवर शत शत वंदन
हे गुरुवर शत शत वंदन

मृदुभाषी स्वभाव सरल है
सादा जीवन प्रेम का मन 
मुख से बहती ज्ञान की गंगा
उन चरणों को कोटि नमन 

हे गुरुवर शत शत वंदन
हे गुरुवर शत शत वंदन

      – स्वरचित अमित पाठक शाकद्वीपी
         फुसरो, बोकारो, झारखण्ड 


Sunday, August 14, 2022

भारत मां की शान में

गा रहा हूं गीत सुहाना
भारत मां के सम्मान में
दाग नहीं लगने अब देंगे
भारत मां के शान में.....2

खड़ा हिमालय बन के मुकुट है
देश के स्वाभिमान में
दाग नहीं लगने अब देंगे
भारत मां के शान में.....2

नदियां जिनके पैर पखारे
देती रत्ने दान में 
दाग नहीं लगने अब देंगे
भारत मां के शान में.....2

लिखी है जिसकी गौरव गाथा
वेदों और पुराण में
दाग नहीं लगने अब देंगे
भारत मां के शान में.....2

इस धरती पर जन्म लिया है
जियें इसी अभिमान में
दाग नहीं लगने अब देंगे
भारत मां के शान में.....2

बच्चा बच्चा वीर यहां के
देशप्रेम बहे प्राण में 
दाग नहीं लगने अब देंगे
भारत मां के शान में.....2

एक स्वर में नाद करें सब
वंदे मातरम् गान में
दाग नहीं लगने अब देंगे
भारत मां के शान में.....2

सबसे आगे देश हमारा
होगा इस जहान में 
दाग नहीं लगने अब देंगे
भारत मां के शान में.....2

फहरे फिर से राष्ट्रध्वज अब
ऊंचा आसमान में
दाग नहीं लगने अब देंगे
भारत मां के शान में.....2

भारत मां की रक्षा हेतु
जान भी दे बलिदान में
दाग नहीं लगने अब देंगे
भारत मां के शान में.....2
    – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Wednesday, July 27, 2022

सोचता हूं बाद मेरे

सोचता हूं बाद मेरे वो शख्स कितना रोएगा
जागेगा सारी रात उस रात कैसे सोएगा 
याद करेगा लम्हें जो बीते होंगे साथ में
जज़्बात को करेगा जाहिर या आंसुओं से धोएगा 
सोचता हूं बाद मेरे वो शख्स कितना रोएगा

कैसे सहेजा राख से अस्थियों को
चिता को साफ करके कैसे तुलसी बोएगा 
खो तो दिया मुझे और क्या क्या खोएगा
सोचता हूं बाद मेरे वो शख्स कितना रोएगा

क्या होगी भी कोई निशानी मेरी उसके हाथ में
देख कर तस्वीर कैसे अपना आपा खोएगा
कहेगा कैसे बात की अकेलापन सा लगता है
खुद ही खुद में इन यादों का भार कैसे ढोएगा
सोचता हूं बाद मेरे वो शख्स कितना रोएगा
       – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Tuesday, July 12, 2022

भोलेनाथ वन्दना

काल जिनके वश में है ये उनका आह्वान है
उनके जैसा न दूसरा देवता कोई महान है

धारण किया है जिसने मस्तक पर चन्द्र को
रखा है अपने भीतर ही सौम्यता और क्रोध को

सारी सृष्टि जिनके तांडव से भयभीत है
वास्तव में शिव जी के जैसा न कोई मित है

धार कर त्रिशूल जग का भार वहन कर रहें
दैत्य दुष्ट प्राणियों का नित्य दमन कर रहें

महादेव की महिमा अगम आपार है
भस्म श्रृंगार भूषण है नाग गले का हार है

तीनो लोको के स्वामी सबको साथ ले कर चल रहे
शब्दो से परे है गुणगान उनकी उपमा ही क्या करे

जगत्पिता है वो सबके हम सब उनकी सन्तान है
आत्मा है विष्णु रूप और शिव रूप प्राण है

न्याय के देवता शनि और यमराज उनके दूत है
है लीन कभी समाधी में तो कभी अत्यंत रूद्र है

महाकाल के शरण में आकर हर भक्त इनका मस्त है
महा मृत्युजंय मन्त्र से कट जाता हर कष्ट है

जाप उनके नाम का तार देता भक्तों को
नत्मस्तक हो नमन है मेरा भोले को

पी लिया गरल को जो देवताओं पर आँच थी
कुछ नहीं रखा है स्वयं के लिए , सारी चीजें बाँट दी

माता पार्वती से जिनको अनन्य प्रेम है 
ब्रह्मांड के है नायक प्रभु तो देवो के भी देव है

महाकाल की वन्दना मैं नित्य प्रति दिन करूँ
हो मोक्ष जी जो कामना तो नमः शिवाय ध्यान धरूँ

शब्द शब्द इस काव्य का शिव को अर्पण है
कर्म जो भी कर रहा हूँ भोले का समर्थन है 

🕉️ नमः पार्वती पतये हर हर महादेव 🙏
             -  ✍️ अमित पाठक शाकद्वीपी



आशाओं के अंकुर

कागा जैसा रूप मिला,  और वाणी जैसे दादुर। पर अपनी मस्ती में  रहते वीर बहादुर।। इक इक कर सब साथ छूट गए, होते गये सभी दूर। अनगिनत च...