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Sunday, July 16, 2023

राम धुनि

राम धुनि : मनहरण घनाक्षरी
( सादर समीक्षार्थ समर्पित)
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विजय विश्वास लिए, राम रस पान किए 
भक्ति विधान का जरा, मार्ग ढूंढ आईए।

दिन रात आठों याम, राम राम लिए नाम 
गाईये भजन कोई , औरों से गवाईए।

हो दिव्य साधना तेरी , है बज रही बांसुरी 
धरिए ध्यान राम का, महा सुख पाइये।

राम गुण राम धुन , राम बोल राम सुन
प्रतिमा राम सीता की , मन मे बसाइये ।
                             – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Friday, July 14, 2023

नाविक

#शीर्षक : नाविक
#विधा : स्वैच्छिक
# विषय : चित्र आधारित 
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जल पथ पर निकली यूं नौका धीरे धीरे
लिए हाथ पतवार ये नाविक खेता तीरे तीरे

लिए अडिग विश्वास हृदय में धारा पार कराता जाता है
अपनी क्षमता के तपबल से लहरों पर मार्ग बनाता है

किस ओर किनारा मिल जाए , कब साहिल से पानी टकराए
कब हासिल हो मंजिल , कब अंधियारा ये छट जाए

कब मान मिले , कब मोल मिले , बस आस लगाए बैठा है
टूटी सी एक कुटिया में परिवार समेत ये रहता है

रात हुईं घर लौट रहा , है कुछ अरमान भी इसके नजरो में
क्यूं डूबी नहीं मुफलिसी इसकी मझधार के उन लहरों में

है कौन यहां प्रदिप्त भला जो इसका भी कुछ भान धरे
महाप्रतापी योद्धा बन नित तूफानों से युद्ध करे

सागर की अपनी क्षमता है ,पर माँझी भी कब थकता है
संकल्प लिए के डटे रहेंगे माँझी हमसे कहता है 

नाविक की तरह ही जीवन में जब लहरों से साक्षात्कार हो
लिए विजय विश्वास हृदय में हम सबकी नैया पार हो
                                 – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Thursday, July 13, 2023

कविता और रद्दीवाला : अमित पाठक

कविता और रद्दीवाला
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एक रोज रद्दी वाला मेरे द्वार पर आया ।
मैने उसे भीतर बुलाया, हाल चाल जान लिया
पूछा आज कितना कमाया?

उत्तर में उसने दबे स्वर में बताया ।
सर आज तो आज का भी गुजारा न कर पाया ।।

सुबह से शाम तक भटका हूं बेमतलब ।
कौड़ी भर भी आमदनी का आज हिसाब नहीं आया ।।

मैंने कहा यूं न अब उदास हो ।
मुझे भी है कुछ बेचना, लाता हूं जो भी मेरे पास हो ।।

लाए गए फिर संदूक में बंद मेरी कॉपियां ।
वक्त का एक दौर मैंने था जिनमें जिया ।।

लिखी थी मेरी लिखावट में कुछ काव्य अंश झलकियां ।
कुछ जीवन के अनुभव थे कुछ थी उनमें मस्तियां ।।

बढ़ा दिया उनको , पूछा दाम क्या लगाओगे ?
बोला मुस्कुराते हुए दस किलो है वजन , आप बीस रुपए पाओगे ।।

शब्दों से रची कल्पना का ये कैसा मोल था ।
एक उम्र में कभी जिनका अमूल्य रोल था ।।

ठीक ठीक लगालो दाम बहुत कम है
कहता है रद्दीवाला, दीमक लगी है कॉपियां और फिर वजन भी तो कम है ।।

ठीक है तय करता हूं रुपए तीस पर ।
आ गया गुस्सा मुझे इसी चीज़ पर ।।

कहा कि दिन भर की कमाई का सब भार मुझसे चूकाओगे ?
ठग रहे हो मुझे ऊंची दुकान में तुम इसका पांच गुणा कमाओगे ।।

कहने लगा रद्दी वाला आप स्वयं पता लगाइए ।
कविता की कीमत का ज़रा भेद जान आइए ।।

बिखरी रहती है पुस्तकें कोई उन्हें छूता नहीं ।
मैं हूं मन का सच्चा मैने किसी को लुटा नहीं ।।

रखिए सहेज इन्हे इनका न अब कोई भाव है ।
अपको बड़ी आत्मीयता है इनसे , इतना क्यों लगाव है?

भाव मेरे मन के मेरे नयनो में चढ़ गए ।
नहीं बेचनी है कविता मुझे हम रद्दी वाले से लड़ गए ।।

दुबारा नए पृष्ठ पर उन कविताओं को सहेज कर ।
रखा है सुरक्षित से एक मेज पर ।।

प्रतिदिन उनको पढ़ता हूं समझता हूं ।
धारा में उन कविताओं की मैं बेलगाम बहता हूं ।।

ये कविता लेखन है मेरी वृति मेरा शौक मेरा सपना ।
मैं अपनी आपबीती इन्ही कविताओं में कहता हूं ।।
                                – अमित पाठक शाकद्वीपी 

शिव वंदना : लघु रूप

जटा से जिनकी गंगा धार नित्य प्रतिदिन बहे,
गले में जिनके वासुकी हार सा लिपटा रहे ।
जिनके डमरू नाद की ध्वनि का यूं प्रसार है,
कि स्वरों में डमरू नाद भी सदैव शिव शिव कहे ।।

जो मां पार्वती के संग दिव्यता के मूल हैं,
जिनमें रमी सृष्टि सारी जिनके हाथो में त्रिशूल है ।
आभार में खड़े हैं जिनके देवता असुर,
सब शिव में निमग्न हो सदैव शिव शिव कहे ।।

मस्तक पे जिनके चंद्रमा विराजमान है शीतलता लिए,
चिता के भस्म राख ने हैं जिनके तन का श्रृंगार किए।
रक्षा में जिसने सृष्टि की , है कालकुट विष पिए,
है देव के भी देव वो , सौम्यता और क्रोध को जो दोनों एक साथ जिए ।।

देव दानव नारी नर , पशु पक्षी चर अचर ,
गान उनके नाम का , है कर रहा अधर अधर।
जो दिव्य ज्योति रुप में हृदय में मेरे बस रहें,
रोम रोम श्वास श्वास करती हैं उनकी वन्दना
सदैव शिव शिव कहे , सदैव शिव शिव कहे ।।
                                     – अमित पाठक शाकद्वीपी



Sunday, May 14, 2023

माँ तेरी याद आती है


कुछ पाने में खोने में , तेरी याद आती है
अकेलेपन में विराने में , तेरी याद आती है

अश्क़ आँखों में होते हैं , तड़पता है मेरा सीना 
जब बातों ही बातों में , तेरी कोई बात आती है

जब होता हूँ बहुत खुशहाल , तो तेरी याद आती है
कभी परेशान करता है कोई सवाल , तो तेरी याद आती है

बैठता हूँ पूजा पर या मेले में जाता हूँ
देखकर माँ दुर्गा की मूरत , माँ तेरी याद आती है

भवन बेशक बनाया है , है परिवार का भी सुख
मगर देखकर तेरा कमरा , तुम्हारी याद आती है

नहीं है रोक टोक कोई , है सुखमय सी आजादी 
मगर जब सुझाव लेना हो , तो तेरी याद आती है

कभी तन्हा जो मैं बैठु , तेरी तस्वीर को देखूं
उसपल में माँ तेरी बोहोत याद आती है 
 - अमित पाठक

Thursday, February 23, 2023

सीमंतिनी

कई बार खुद को परखना जो चाहा
हर बार सभी ने बेड़ियां लगाई

टोका रोका सभी ने मुझे हर पल
अपने मन का भी कहां मैं कर पाई

आभाव में गुजार दी बचपन मैंने अपनी
कम ही पढ़ाई मेरे हिस्से आई

दहलीज तक सीमित थी दुनिया ये मेरी
जबरदस्ती के सौख थे कलछी कड़ाही

सबकी उम्मीदें की मैंने पूरी
मेरी ख्वाहिशें किसी को नजर ही न आई

बीता जो बचपन जवानी जो आई
कहने लगे सब मुझको पराई

न पूछा न जाना किसी ने हाल मेरा
देखा शुभ दिन कर दी बिदाई

न्यौछावर किया है जीवन ये अपना
मैंने अपनी भूमिका बखूबी निभाई

अब बस जीवन से उम्मीद है इतनी
बनी रहूं मैं प्रेम की परिभाषा रोशन करूं सजन की अंगनाई

हो लंबी उम्र पिया जी तुम्हारी
मैंने तेरी खातिर ये मांग है सजाई

कभी दहलीज मायके की तो कभी ससुराल की सीमा पर हूं ठहरी
शायद इस लिए तो नहीं मैं सीमंतिनी कहलाई ??

पर इन सारी ही चीजों में रहा कुछ अधुरा ही सदैव,
आज भी जारी है मेरे आस्तित्व की लड़ाई।
                  – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Wednesday, February 15, 2023

रंगो से रंजिश


किस रंग में रंगे खुद को
सब बेरंग हो गए
बदलता रंग देखा उनका
हम दंग हो गए

रंग लाल मेरे पसन्द का
बस मलाल दे गया
लिबास लाल ही तो था
उन्हें कोई और ले गया

पीले रंग पर भी कहो 
क्या सवाल करूं ?
हल्दी की रस्म या 
दिल पर चोट की बात करूं 

हरा रंग भी अब 
हमें कहां भाता है ?
हराया किस्मत ने हमें 
ये याद दिलाता है

रंग हसीन सारे ही खो गए
रंग असलियत का देख कर गमगीन हो गए
समझाया खुद को बोहोत अकेले में
भीड़ में हम भी रंगीन हो गए

हर रंग से शिकायत है
हर रंग में है मस्ती प्रीत की
रंगा है जो खुद को नए रंग में तो समझा
विफलता के रंग के आगे है गुलाल भी जीत की
            – अमित पाठक शाकद्वीपी 

आशाओं के अंकुर

कागा जैसा रूप मिला,  और वाणी जैसे दादुर। पर अपनी मस्ती में  रहते वीर बहादुर।। इक इक कर सब साथ छूट गए, होते गये सभी दूर। अनगिनत च...