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Thursday, August 21, 2025

स्त्री का मन

स्त्री का मन 
तुम क्या जानो स्त्री के मन को,
कैसी इसकी चाह?
वेग प्रबल कोई धार नदी की,
ऐसी यह अमित अथाह।।

मन की पीड़ा मन में रखती,
होठों पर उत्साह,
नारी मन को जान सके न,
परम पिता ब्रह्मा।।

पीकर भेद भाव के विष को,
जलती अंतर्दाह,
सुख में दुख में तुझ संग होती,
देती सदा सलाह।।

कभी क्रोध में बने कालिका,
सब कुछ करें तबाह,
कभी प्रीत के रस में कर लें,
सारा जीवन निर्वाह।।

स्नेह करें तो सब सुख त्यागे,
तुझे दिखाए राह,
नारी जग की अनुपम सृष्टि,
अद्भुत रचना वाह।।

– अमित पाठक शाकद्वीपी 


Friday, July 25, 2025

कपाली शिव शंकर

डडम डम डडम डडम डम डडम
डडम डम डडम डम डम डम 
हर हर शंकर हरते तम 
डडम डम डडम डडम डम डडम
डडम डम डडम डम डम डम
 
जय गिरिजापति दीन दयाला,
हाथ पिनाक भुजंग की माला।
शशि शीतल मस्तक पर सोहे,
भस्म रमा तन मन को मोहे।।

गौर वर्ण और छवि निराली,
जय भूतेश्वर जय हो कपाली।
डम डम डमरू ध्वनि सुनाए,
नाद नाद प्रभु महिमा गाए।।

अखिल विश्व के नायक तुम हो,
दुःख नाशक सुख दायक तुम हो।
तांडव तेरा नृत्य मन भावन,
धन्य धरा को करते पावन।।

दमन किए शत्रुन् के दल को,
वेद बखाने तुम्हरे बल को।
हरि चिंतन में खोए रहते,
राम राम अंतर्मन में कहते।।

सारे जग तारक तुम हो,
पालक हरि संहारक तुम हो।
सृष्टि रथ की डोर सम्हाले,
अद्भुत हो बाघाम्बर वाले।।
          – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Monday, July 21, 2025

शिव ध्यान

कण्ठे यस्य विराजते हि गरलं शीर्षे च मन्दाकिनी
वामाङ्गे गिरिजाननं कटितटे शार्दूल चर्माम्बरम्।।
माया यस्य रुणद्धि विश्वमखिलं तस्मै नमः शम्भवे
जम्बुवज्जल विन्दुवज्जल जव ज्जम्  बालव ज्जालवत्।।

कण्ठे यस्य विराजते हि गरलं , गंगाजलम् मस्तके ।
वामांगे गिरिराज राजतनया जाया भवानी स्थिता: ।।
नन्दी स्कन्द गणाधिनाथ सहित: केदारनाथ प्रभो ।
केदारांचल संस्थिता हि सतत् कुर्यात सदा मङ्गलम् ।।


Thursday, July 17, 2025

प्रेम पथिक की अभिलाषा –(स्वर्णिम दर्पण में प्रकाशित)

थी प्रेम पथिक की ये आशा 
कि फिर उनका दीदार हो
हो खड़े आमने सामने 
बाते भी दो चार हो

बीती बातें याद कर 
मुस्कुराएं हम दोनों
कुछ नया नवेला गढ़ने को
भी दोनो तैयार हो

थी प्रेम पथिक की अभिलाषा
कि फिर उनका दीदार हो

किस्मत का भी हो रुख
हमारे पक्ष में
सितारों की मेहरबानी से
खुशियों की बौछार हो 

थी प्रेम पथिक की अभिलाषा
कि फिर उनका दीदार हो

थामने को हाथ उनका 
ख्वाहिश कब से लिए बैठा हूं
दिल की ऐसी भी तमन्ना
पूरी इस बार हो
थी प्रेम पथिक की अभिलाषा
कि फिर उनका दीदार हो

– अमित पाठक शाकद्वीपी 

महाकाल मतवाला

सिर पे जटा और अंग विभूति,
शीश शशि अरु भांग की बूटी,
नेत्र धधकती ज्वाला,
वो महाकाल मतवाला।।

आन पड़ी जब विश्व पे संकट,
याद करें उन्हें देव दनुज नर,
तब पीए हलाहल प्याला,
वो महादेव मतवाला।।

पार्वती के संग विराजे,
हाथ डमरू पिनाक है साजे,
तन बाघाम्बर छाला,
वो आदिगुरु मतवाला।।

भूतन संग वो डेरा डाले,
डोर जगत की रहें संभाले,
रखें अद्भुत रूप निराला,
वो आदियोगी मतवाला।।

ध्यान धरूं बस महिमा गाऊँ,
पल पल प्रति पल शीश नवाऊँ,
कष्ट हरे जो सारा, 
देव वो भोला भाला।।

हर हर महादेव 

– अमित पाठक शाकद्वीपी 

Saturday, July 12, 2025

शूलपाणी

जय देव उमापति शिव शंकर,
हे महादेव प्रभु अभयंकर।
हो नाथ महेश सुरेश प्रभु,
जग जपता है शिव हर हर हर।।

हो घट घट के प्रभु तुम वासी,
हे शम्भु स्वयंभू अविनाशी।
हे शूलपाणी औघड़ दानी,
हे गिरिजापति हे कैलाशी।।

केदारेश्वर भूतेश्वर तुम,
पल पल समाधि में रहते गुम।
हो सौम्य कहीं, फिर रौद्र भी हो,
भोले भी हो कहीं क्रोध भी हो।।

कहीं आदियोगी और आदिगुरु,
तुम से ही सृष्टि होती शुरू।
काल से परे महाकाल हुए,
हरि सेवा को विकराल हुए।।

तुम आशा की परिभाषा से,
द्रवित हृदय की भाषा से।
तुम सा कौन हुआ ज्ञानी,
सबसे बढ़कर प्रभु तुम दानी।।

इस जग का अब उद्धार करो,
हम सब का बेड़ा पार करो।
अपने ही गण में रख लो कहीं,
अब अभिलाषा बस रही यही।।

काव्य रूप इस धार से, 
शिव का करूं अभिषेक,
भाव रूपी यह बेलपत्र,
अर्पण करूं अनेक।।

– अमित पाठक शाकद्वीपी 



अमित पाठक शाकद्वीपी

हूँ कौन और किस लिए धरा पर,
उस ईश्वर ने मुझे उतारा है।
उसकी मर्जी वो ही जाने,
सब उसका ही इशारा है।।

नाम समान ही अमित अथाह मैं, 
उग्र नदी का जल प्रवाह मैं।
लहरों सी आशाएं हरपल मन में रहूं समेटे,
विषधर जैसे डस लूं उनको, मुझसे गर कोई ऐंठे।।

धरती जैसी सहनशीलता, 
सूरज जैसा गुस्सा।
कभी कहीं मैं बिलकुल बुद्धू, 
अकल पड़ा ज्यों भूसा।।

रहूं अटल हिमवान सरिस, 
पर तृण पत्र सा डोलूं।
मित्रवत है नेह हमारा, 
सब से हस कर बोलूं ।।

कभी कहीं अकेले चल दूं,
फिर साथ किसी के हो लूं ।
बिना विचारे कुछ भी बक दूं,
जब जब मुख मैं खोलूं।।

लिए विजय विश्वास हृदय में,
सब से नाता जोडूं।
हर क्षण में मैं साथ निभाऊं,
हाथ कभी न छोड़ूं।।

अपने मुख से क्या ही सुनाऊं,
अपना मैं व्याख्यान।
सारी ही चीज़ों में प्रिय बस, 
अपना स्वाभिमान।।

अमित पाठक शाकद्वीपी 

आशाओं के अंकुर

कागा जैसा रूप मिला,  और वाणी जैसे दादुर। पर अपनी मस्ती में  रहते वीर बहादुर।। इक इक कर सब साथ छूट गए, होते गये सभी दूर। अनगिनत च...