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Sunday, July 7, 2024
Tuesday, July 2, 2024
मां प्रकृति
उतरी धरा पर जब मैं,
बनकर के मां तुम्हारी,
सींचा हृदय लगा कर,
हर ली विपत्ति सारी।
तुझको गले लगाया,
जब गोद में उठाया,
देकर के अपनी धड़कन,
काबिल तूझे बनाया।
मैंने तुम्हें संवारा,
मैंने तुझे सजाया,
माता का धर्म अपना,
हर पल ही था निभाया।
फिर क्या हुआ जो तुमने,
ऐसे मुझे सताया,
काटे मेरी शाखाएं,
इक वृक्ष न लगाया।
कभी छीन मेरा जीवन,
कई आशियां बनाएं,
धुएं में मुझको झोंका,
प्रलाप ही आजमाएं।
पर मां हूं मैं तुम्हारी,
मर कर भी तुझको चाहूं,
कुपुत्र तू हुआ है,
कुमाता न मैं कहाऊं।
मैं सौंपूंगी तुझको सबकुछ,
दे दूंगी प्राण वायु,
संतान की रक्षा में जैसे,
खर्चे कोई मां अपनी आयु।
कुछ सीख आजमाओ,
और पुत्र धर्म निभाओ,
काटे हैं कितने जंगल,
कुछ बाग भी लगाओ।
© अमित पाठक शाकद्वीपी
Sunday, June 30, 2024
संगम
संगम
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तुम गंगा कि अनुपम धारा,
मैं बहता हूं आवारा,
हम दोनों का मिलन है मुश्किल,
जाने जग ये सारा।
फिर भी मिल जाए जो दोनों,
तो अद्भुत हो ये नज़ारा,
कुछ तुम खुद को मेरी कर दो,
कुछ मैं हो जाऊं तुम्हारा।
आश मिलन की श्वास श्वास में,
पर मिल न पाए बेचारा,
यत्न सभी तो विफल रहे हैं,
कभी मिला न कोई इशारा।
मैं बहुं अब यमुना सा कल कल,
तकूं राह तुम्हारा,
चाह ह्रदय की प्रयाग है बनना,
और संगम हो हमारा।
तुम गंगा कि अनुपम धारा,
मैं बहता हूं आवारा,
हम दोनों का मिलन हुआ तो,
झूमे जग ये सारा।
© अमित पाठक शाकद्वीपी
Saturday, June 29, 2024
उल्टे सीधे कानून
उल्टे सीधे कानून
कैसे ये उल्टे सीधे कानून,
पल पल नर का चूसे खून,
कभी सही को गलत बताया,
कभी गलत को सही लिया चुन।
कभी गर्त मे हमें धकेला,
मानो लिखते आंखें मूंद,
शर्म लाज अब बची नहीं है,
त्याग दिया क्या एक एक बूंद।
जिसने सोचा बस अपना सोचा,
जनता को हरदम ही नोचा,
कोई क्या ही न्याय करेगा,
विधि व्यवस्था भी कितना ओछा।
स्याही न अब सत्य बखाने,
झूठ के दिखते कई बहाने,
जिनकी जेब की वजन बड़ी है,
न्यायधीश को लगे सुहाने।
कुछ भी बोलो कुछ भी जानो,
बुरा भला तो पहचानो,
किसकी कितनी सी गलती है,
इसका तो पैमाना अपनालो।
फिर भी गर हो कोई मजबूरी,
चीज़े बस रखनी हो अधूरी,
तो न्याय का सपना छोड़ो,
अपनी रेस अपने से दौड़ो।
देखो कोई जो कहीं बुराई,
और न आवाज़ उठाई,
ख़ुद को बस फ़िर कायर जानों,
कुछ नहीं कर सकते हो मानो।
किसी पे न आक्षेप लगाओ,
जो चलता बस देखते जाओ,
इतने तक तो सब कुछ झेला,
बस झेलते जाओ और मुस्कुराओ।
@ अमित पाठक शाकद्वीपी
Wednesday, June 19, 2024
पायल
बड़े अदम से मैं सोने चांदी में बनवाया गया,
किसी खास मौके पर श्रृंगार सा पैरो में सजाया गया,
मेरी घुंगरू की ध्वनि का असर इतना प्रबल था,
मुझसे हर चाल पर ताल से ताल मिलाया गया।
मैंने शोभा निखारी तेरे दोनों पैरों की,
जब जब मुझ पायल को तूझे पहनाया गया,
मौके पर तेरे ब्याह की मैंने खुशी दुगनी सी कर दी,
ससुराल में जब मेरे ही बल पर इतराया गया।
तेरे पी की प्रिय मैं पांव की पायल,
शोर से करती हूं व्याकुल मन को घायल,
थिरक कर मैंने ही सुकून की बौछार की तुम पर,
आशिक सभी मुझ पायल के कायल।
@अमित पाठक शाकद्वीपी
Tuesday, June 11, 2024
संगी साथी
लेकर इन हाथों में हाथ,
देना है जीवन भर साथ,
बन कर दोस्त रहेंगे ऐसे,
दो बदन एक जान हो जैसे।
अब संग संग ही चलना होगा,
धुप छांव सम ढलना होगा,
होगी बाते जब हम दोनो की,
जिगरी दोस्त थे कहना होगा।
हाथो में लेकर हाथ प्रिये
अब रहना बस मेरे साथ प्रिये,
इस दिल की धड़कन में बसा लिया,
तेरे आगे जुकाऊँ माथ प्रिये।
हम दोनों ही रहे एक सदा
न कोई अलग अलग दिखता हो
इस रिश्ते का न मोल कोई
अद्भुत अनमोल ये रिश्ता हो।
मिलकर इस जग को जीतेंगे,
कोई बोले ज्यादा तो पीटेंगे,
जब हम राजी तो सब राजी
सब प्रेम से ही अब सोचेंगे।
साथ साथ ही झूमे गाएं,
एक दूजे को हर बात बताएं,
वादा करते हैं अब तुमसे,
दूर रहना न होगा हमसे।
© अमित पाठक शाकद्वीपी
Monday, June 10, 2024
जल संरक्षण
साक्षात जीवन जहां विद्यमान,
सींच रही हूं धरती को,
और ह्रास करूं इस परती को।
बादल से बरसी घनन गहन,
तो हरित किया है वाता वरण,
जल की बूंदों में सब होके मगन,
नाचे ज्यों नाचे मयूर सा मन।
कभी पोषण हो कोई वृक्ष कहीं,
कहीं बुझाऊं कोई प्यास कभी,
कभी प्रबल वेग में बहती चली,
तो दूर किए बाधायें सभी।
कभी पर्वत का सीना फाड़े,
और कदम धरती पर डारे,
कभी शिथिल शिथिल बस बहती रही मैं,
कल कल वेगो में कुछ कहती रही मैं।
इसे सहेजो तुम कदम कदम,
न इसको तुम अब दूषित करो,
तन मन धन से बस पोषित करो।
कहीं ह्रास न कर दो इस अमृत को,
संरक्षण से न विस्मृत हो,
कुछ नीति कुछ प्रयास करो,
इसे रक्षण का अभ्यास करो।
© अमित पाठक शाकद्वीपी
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