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Monday, June 10, 2024

जल संरक्षण

हूं मैं नदी, झरने और कूप महान,
साक्षात जीवन जहां विद्यमान, 
सींच रही हूं धरती को,
और ह्रास करूं इस परती को।

 बादल से बरसी घनन गहन,
तो हरित किया है वाता वरण,
जल की बूंदों में सब होके मगन,
नाचे ज्यों नाचे मयूर सा मन।

कभी पोषण हो कोई वृक्ष कहीं,
कहीं बुझाऊं कोई प्यास कभी,
कभी प्रबल वेग में बहती चली,
तो दूर किए बाधायें सभी।

कभी पर्वत का सीना फाड़े,
और कदम धरती पर डारे,
कभी शिथिल शिथिल बस बहती रही मैं,
कल कल वेगो में कुछ कहती रही मैं।

जल जीवन जग में जन्म जन्म,
इसे सहेजो तुम कदम कदम,
न इसको तुम अब दूषित करो,
तन मन धन से बस पोषित करो।

कहीं ह्रास न कर दो इस अमृत को,
संरक्षण से न विस्मृत हो,
कुछ नीति कुछ प्रयास करो,
इसे रक्षण का अभ्यास करो।

© अमित पाठक शाकद्वीपी 



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