THANK YOU FOR VISITING
Sunday, July 7, 2024
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
शकुंतला दुष्यंत
कितना बेहतर जीवन था, दिन थे कितने गुलजार। उपवन बीच बसेरा अपना, पुष्पों की थी सजी बहार।। आए एकदिन राजकुंवर फिर करने को था रहा शिक...
-
अप्रैल 2022, उन दिनों में मैं योर कोट नाम के एक ऐप पर छोटी-छोटी रचनाएं लिखा करता था। छोटी-छोटी मुक्तक लिखने के लिए यह एक अच्छा स...
-
प्रेम पथिक की अभिलाषा का क्यों ऐसा उपहास किया, बार बार छलने को ही बस प्रयास किया। अनसुना कर गए बात और वादा भी कहां साकार है, निर्लज...
-
साहित्य का ये कैसा दौर... (लेख) इन दिनों साहित्य ऐसे दौर से हो कर गुजर रहा है जिसमें साहित्यकार केवल और ...
No comments:
Post a Comment