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Monday, September 25, 2023

क्या करें??

क्या करें??
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विकृत होती है मानसिकता 
सोच घिनौनी होती है 
बढ़ा के हाथ सहारे का 
फिर वही शख्स दबोचे तो क्या करें?

ये शहर किस ओर जा रहा है?
सड़क पर खड़ा बुड्ढा भी
आधी उम्र की बहु बेटियों को है निहारे
कहो ऐसी नज़र का क्या करें?

कुछ लोग बड़े बेचैन है जानें क्यों?
बेवजह पिछे पड़े रहते हो किसी के
कौन सा है ये घटिया हुनर
 कहो इस हुनर का क्या करें?

इंसानी खाल में भेड़ियों सी ये हरकतें
कोई इन हरकतों से साथ क्यों गुजर बसर करे
नुमाइश कर रहे हो, है चरित्र का चीरहरण ये
कोई जान कर आपकी विकृति क्यों आपका कदर करें।
                  – अमित पाठक शाकद्वीपी

Monday, August 28, 2023

पछतावा

थे अरमान दिल के हम भी रेस में अव्वल रहे
मगर न जानें कब रास्ता बदल गया ।
बड़ी मुश्किल से हासिल की थी एक अच्छी सख्शियत  अपनी
उम्र के एक दौर ने वो रूतबा निगल लिया।।

ख्वाहिशें हाथ से रेत की तरह पिछली
कुछ भी न ठहरा सारा ही निकल गया।
न तपीस है न उजाला ही है जीवन में
मेरे हिस्से का तो मानो सूरज ही ढल गया।।

बड़े लोगो में गिनती होती है उनकी
उनको देखकर जो खुद को देखा मेरा दिल दहल गया।
सड़क पर उनको आते देखा तो
मैं खुद ही खुद राह बदल कर निकल गया।।

अब न आरजू है न तमन्ना है कोई
अमित गिरते गिरते पर संभल गया।
समझो सबको सबकुछ नहीं मिलता 
मेरी किस्मत में विधि का ऐसा ही कलम चल गया।।
                        – अमित पाठक शाकद्वीपी 


Sunday, August 20, 2023

गणेश वंदना



गणेश वंदना
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जय गणपति जय गिरिजा नंदन,
मूषक वाहन असुर निकंदन,
वक्रतुंड शुचि सूंड सुहावन,
मंगल मूर्ति जय पाप नशावन।

जय गणेश जय जय गणनायक,
आदि देव जय सब सुख दायक,
भाल चंद्र जय जय गजकर्णक,
सुमुख सुरेश जय विघ्न विनाशक।

दुर्वा दल श्रृंगार तुम्हारा,
पान फूल लगे कितना प्यारा,
एकदंत दयावंत कहाते,
विकट विनायक सबके मन भाते।

जय जय हे सिद्धि बुद्धि के दाता,
जय महेश जय पार्वती माता,
सुंदर शोभा अद्भुत तन की
आन हरो अब विपदा जन की।

देते सबको वर मन अभिलाषित,
तुमसे सृष्टि है परिभाषित,
शब्द शब्द मैं महिमा गाऊं,
चरण कमल में भाव चढ़ाऊं।

दास अमित की वंदना, करना प्रभु स्वीकार,
साष्टांग दंडवत नमन करते बारंबार।।
               – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Monday, July 31, 2023

शिव पार्वती प्रसंग : मां पार्वती धन्य हुई, महादेव सा वर पाकर।

मां पार्वती धन्य हुई, महादेव सा वर पाकर।
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बाल्य काल में तप के बल शिव जी से वर ये पाया था।
भूखे प्यासे कर के तपस्या उनके आसन को डगमगाया था।।
अड़ी रही कि उन बीन कोई न जीवन का मेरे आधार होगा ।
होने को बस वही होंगे सब , उनसे ही मेरा सोलह श्रृंगार होगा।।

डटी रही अपनी कथनी पर , शिव को सब समर्पण कर ।
रोम रोम में शिव को बसाया , शिव शिव जपते थे ये अधर ।।
घने वन मे बना कर कंद्रा करती शिव का पूजन ।
निराहार रही कभी , कभी किए कंद मूल फल भोजन।।

समय परम प्रबल और पावन , आया जब सर्वेश । 
लेने को फिर प्रेम परीक्षा आए स्वयं महेश।।
बोले प्रसन्न हूं वर मांगो कोई नेक ।
बोलीं पार्वती यूं हंसकर, है मन में भाव अनेक ।।

फिर सबसे बड़ी यह इच्छा आप संग हो यूं योग।
पति रूप में आन मिलो तो अद्भुत हों संयोग।
हर्षित मन से शिव शंकर ने दिए मन अभिलाषित वर ।
धन्य हो गई माता पार्वती महादेव को पाकर, उनसे ब्याह रचाकर ।।
                      – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Monday, July 17, 2023

शिव वंदना

#मनहरण घनाक्षरी
# विश्वनाथ वंदना 
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जय देव दिवाकर , मणि ताज सुधाकर
तन भस्म रमाकर, धरणीधर गहे ।

सर्प हार बनाकर , मृग छाल सजाकर
गुरु देव दया कर , ह्रदय वास रहे।

भूषित छवि सुंदर , जय श्री करुणाकर
पूजे देव निशाचर , जटा से गंग बहे।

जय पशुपति शंकर , उमापति जै भूधर
अति रूप मनोहर ,  तिनहु लोक कहे।

©️✍️ अमित पाठक शाकद्वीपी 

क्षणे क्षणे कृतं पापं स्मरणेन विनश्यति।
पुस्तकं धारयेत् एही आरोग्य भयनाशनम् ।।

हर हर महादेव , जय शिव शम्भू 🙏

Sunday, July 16, 2023

राम धुनि

राम धुनि : मनहरण घनाक्षरी
( सादर समीक्षार्थ समर्पित)
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विजय विश्वास लिए, राम रस पान किए 
भक्ति विधान का जरा, मार्ग ढूंढ आईए।

दिन रात आठों याम, राम राम लिए नाम 
गाईये भजन कोई , औरों से गवाईए।

हो दिव्य साधना तेरी , है बज रही बांसुरी 
धरिए ध्यान राम का, महा सुख पाइये।

राम गुण राम धुन , राम बोल राम सुन
प्रतिमा राम सीता की , मन मे बसाइये ।
                             – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Friday, July 14, 2023

नाविक

#शीर्षक : नाविक
#विधा : स्वैच्छिक
# विषय : चित्र आधारित 
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जल पथ पर निकली यूं नौका धीरे धीरे
लिए हाथ पतवार ये नाविक खेता तीरे तीरे

लिए अडिग विश्वास हृदय में धारा पार कराता जाता है
अपनी क्षमता के तपबल से लहरों पर मार्ग बनाता है

किस ओर किनारा मिल जाए , कब साहिल से पानी टकराए
कब हासिल हो मंजिल , कब अंधियारा ये छट जाए

कब मान मिले , कब मोल मिले , बस आस लगाए बैठा है
टूटी सी एक कुटिया में परिवार समेत ये रहता है

रात हुईं घर लौट रहा , है कुछ अरमान भी इसके नजरो में
क्यूं डूबी नहीं मुफलिसी इसकी मझधार के उन लहरों में

है कौन यहां प्रदिप्त भला जो इसका भी कुछ भान धरे
महाप्रतापी योद्धा बन नित तूफानों से युद्ध करे

सागर की अपनी क्षमता है ,पर माँझी भी कब थकता है
संकल्प लिए के डटे रहेंगे माँझी हमसे कहता है 

नाविक की तरह ही जीवन में जब लहरों से साक्षात्कार हो
लिए विजय विश्वास हृदय में हम सबकी नैया पार हो
                                 – अमित पाठक शाकद्वीपी 

आशाओं के अंकुर

कागा जैसा रूप मिला,  और वाणी जैसे दादुर। पर अपनी मस्ती में  रहते वीर बहादुर।। इक इक कर सब साथ छूट गए, होते गये सभी दूर। अनगिनत च...