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Wednesday, November 26, 2025

सीता राम विवाह पंचमी

श्री सीता राम विवाह पंचमी
सीता सुकुमारी – अवध बिहारी, 
आज बंधे इक डोर से।
हर्षित नर नारी, सृष्टि सारी, 
होते भाव विभोर से।।

स्वयंवर को आए रघुराई,
सहज भाव लिऐ धनुष उठाई।
प्रेम पथ के आरोहण को 
खींचे डोर फिर ज्यारोपण को।।

खींचत ही जब शिव धनु टूटा,
विदेह राज का संताप भी छूटा।
दमक उठी उस पल यूं दामिनी,
भूमि पर हो आ गई चांदनी।।

परशुराम तत्क्षण जा पहुंचे,
धनु तोड़न का कारण पूछे।
ज्ञात हुई जो सारी कहानी,
दिए आशीष मुनि बड़ ज्ञानी।

नेह रंग में रंगी वैदेही, 
करे परिहास सखी सनेही।
नारायणी भी श्रीनिधि होके, 
हिय के भाव हिय में रोके।।

प्रभु जी श्यामल श्यामल सोहे, 
जनकसुता के मन को मोहे।
जयतु जयतु जय मातु जानकी, 
अतिशय प्रिय करूणानिधान की।।

मंगल सी यह बेला पावन,
जनकपुर को अति मनभावन।
स्वयं प्रभु जो बने जमाई, 
संग सिया के ब्याह रचाई।।

जन जन का यूं हृदय था हर्षा,
होने लगी पुष्पों की वर्षा।
नयन कमल भी मोती लुटायें,
लोग नगर के नाचे गायें।।

क्या ही वर्णन आज करूं,
प्रभु मैं परिणय रास का,
उत्सव प्रीत पुनीत का,
यह अटूट प्रेम आभास का।

– अमित पाठक शाकद्वीपी

Tuesday, November 25, 2025

अमित पाठक शाकद्वीपी उपमा अलंकार

जिसकी उपमा होती नहीं, 
जो है असीम अथाह, 
उसी अनंत अर्णव सरिस ही 
अपना भी रहा प्रवाह।

थोड़े से में मन न माने, 
अपनी अनुपम चाह,
कम से बेहतर कुछ न मिले तो, 
बेहतर हो निर्वाह।।

शाकद्वीपी सूर्य अंश से, 
उदयमान यह सृष्टि, 
सूरज सा ही तेज प्रबल है, 
देख मिला कर दृष्टि।

अपने तम से खुद जल बैठा, 
स्वयं स्वयं की ऋष्टि,
मन की वह्नि को शिथिल जो कर दे, 
ढूंढूं ऐसी वृष्टि।

– अमित पाठक शाकद्वीपी 

Thursday, November 20, 2025

सपनों का वह गांव सुहाना

सपनों का वह गांव सुहाना, 
जहां रहते थे नानी नाना।
होता था कभी आना जाना,
गर्मी छुट्टी में समय बिताना।।

चारपाई एक द्वार पड़ी थी,
नाना की साइकिल खड़ी थी।
बाहर आम का सुंदर उपवन,
खेतों में खलिहान सुहावन।।

हर पल मस्ती, रहते थे हँसते,
कच्चे घर के वो पक्के रिश्ते।
गुड़ की महक से हवा भी महके,
बुलबुल, मोर, कोयलिया चहके।।

पगडंडी से आते जाते,
मिट्टी से थे तन को सजाते।
पीते थे मटके का पानी,
क्या ही पल ये यार सुहानी।।

अब तो ये समय जा बदला,
बदल गई कहानी।
नानी नाना दोनों गुजरे,
गुजरी याद पुरानी।।

गांव बन कर शहर जा उभरा, 
पक्के छत अब, खोया खपरा।
पक्की सड़के घर को छूती,
मॉल गया बन घर के पिछोती।।

गांव गांव अब शहर से बढ़कर,
सबके घर पे बिजली, मोटर।
सबके ठौर ठिकाने बदले,
जब से नए जमाने बदले।।

अब तो नदियों पर भी दिखते नहीं हैं नाव।
लगता है कि खो सा गया है सपनो वाला गांव।।

– अमित पाठक शाकद्वीपी 


Wednesday, November 19, 2025

सुहानी सुबह


उदित हुए जब देव दिवाकर,
छट से गए सब तिमिर निशाचर।
ओस पर्ण के वाष्पित हो गए,
ज्यों आई ये किरण धरा पर।।

हमने भी तब आलस त्यागे,
फिरने लगे सब भागे भागे।
सबके तन में फुर्ती जागी,
दुनिया सारी काम में लागी।।

देख गगन की सुंदर आभा,
पक्षी गण का शोर शराबा।
सुहानी सुबह की ताजी हवाएं,
हरे भरे उपवन महकाए।।

हाथ लिए मैं चाय की प्याली,
देखूं ये अद्भुत हरियाली।
कुदरत के नैसर्गिक सुख को,
रचना में मैंने लिख डाली।।

उड़े गगन में खग अनुरागी,
तकती जाऊं बस मैं वैरागी।
खुद को खुद ही डांट लगाऊं,
पहले क्यों न इस पल जागी,

प्रभु की सुंदर सृष्टि देखूं 
मन ही मन मुस्काऊं 
देख देख मैं सुबह सुहानी,
फुले नहीं समाऊं।।
       – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Wednesday, October 29, 2025

कहा रहती है सारी नदियां और तीर्थ

तत्रैव गंगा यमुना च त्रिवेणी, गोदावरी सिंधु सरस्वती च।
सर्वाणि तीर्थानि वसन्ति तत्र, यत्राच्युतोदारकथाप्रसङ्गः॥

Thursday, August 21, 2025

स्त्री का मन

स्त्री का मन 
तुम क्या जानो स्त्री के मन को,
कैसी इसकी चाह?
वेग प्रबल कोई धार नदी की,
ऐसी यह अमित अथाह।।

मन की पीड़ा मन में रखती,
होठों पर उत्साह,
नारी मन को जान सके न,
परम पिता ब्रह्मा।।

पीकर भेद भाव के विष को,
जलती अंतर्दाह,
सुख में दुख में तुझ संग होती,
देती सदा सलाह।।

कभी क्रोध में बने कालिका,
सब कुछ करें तबाह,
कभी प्रीत के रस में कर लें,
सारा जीवन निर्वाह।।

स्नेह करें तो सब सुख त्यागे,
तुझे दिखाए राह,
नारी जग की अनुपम सृष्टि,
अद्भुत रचना वाह।।

– अमित पाठक शाकद्वीपी 


Friday, July 25, 2025

कपाली शिव शंकर

डडम डम डडम डडम डम डडम
डडम डम डडम डम डम डम 
हर हर शंकर हरते तम 
डडम डम डडम डडम डम डडम
डडम डम डडम डम डम डम
 
जय गिरिजापति दीन दयाला,
हाथ पिनाक भुजंग की माला।
शशि शीतल मस्तक पर सोहे,
भस्म रमा तन मन को मोहे।।

गौर वर्ण और छवि निराली,
जय भूतेश्वर जय हो कपाली।
डम डम डमरू ध्वनि सुनाए,
नाद नाद प्रभु महिमा गाए।।

अखिल विश्व के नायक तुम हो,
दुःख नाशक सुख दायक तुम हो।
तांडव तेरा नृत्य मन भावन,
धन्य धरा को करते पावन।।

दमन किए शत्रुन् के दल को,
वेद बखाने तुम्हरे बल को।
हरि चिंतन में खोए रहते,
राम राम अंतर्मन में कहते।।

सारे जग तारक तुम हो,
पालक हरि संहारक तुम हो।
सृष्टि रथ की डोर सम्हाले,
अद्भुत हो बाघाम्बर वाले।।
          – अमित पाठक शाकद्वीपी 

आशाओं के अंकुर

कागा जैसा रूप मिला,  और वाणी जैसे दादुर। पर अपनी मस्ती में  रहते वीर बहादुर।। इक इक कर सब साथ छूट गए, होते गये सभी दूर। अनगिनत च...