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Saturday, May 14, 2022

मेरे बच्चे की किलकारी

मेरे बच्चे की किलकारी मुझे माँ बनाती है
(मातृत्व काव्य सृजन)
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मेरे बच्चे की किलकारी मुझे माँ बनाती है,
मैं हँसती हूँ उस पल में जो गुड़िया मुस्कुराती है ।
          मेरे बच्चे की किलकारी मुझे माँ बनाती है।।

नया सम्बन्ध बना हैं यूँ उसे देने हैं जीवन मूल्य,
उसे मैं सीख देती हूँ वो मुझें जीना सिखाती है ।
          मेरे बच्चे की किलकारी मुझे माँ बनाती है।।

कभी जो चोट लगे तो गुड़िया मरहम लगाती है,
नए समाज में ढलना मुझें हर पल बताती है ।
          मेरे बच्चे की किलकारी मुझे माँ बनाती है ।।

मन में हैं आशाएं बड़े धूमधाम से व्याहुँगी, 
मगर विदाई का जो मैं सोचुँ आँखे भर ही आती है ।
          मेरे बच्चे की किलकारी मुझे माँ बनाती है।।

सुखद एहसास है उसका होना भी,
मेरी बिटिया मेरे कामो में मेरा हाथ बटाती है ।
          मेरे बच्चे की किलकारी मुझे माँ बनाती है ।।

कभी आए कोई मेहमां हमारे घर, 
मैं बातें करती हूँ गुड़िया नास्ता ले आती है।
          मेरे बच्चे की किलकारी मुझे माँ बनाती है।।

सिखाना कुछ नहीं पड़ता वो खुद सब सीख जाती है,
कहाँ झुकना है रुकना है माँ बस इतना बताती है ।
            मेरे बच्चे की किलकारी मुझे माँ बनाती है ।।
                    - अमित पाठक

मातृत्व

ये जो काया है न तेरी ये उपहार उसी का है
तेरा जो भी मान है जग में दान उसी का है
बेशक हो गए हो सफल तुम जीवन में 
तेरी सफलता में भी उपकार उसी का है 

जिस समाज में चहकते हो फुदकते हो
ठीक से देखो ये संसार उसी का है 
तेरी जीत में ही जीत है उसकी 
तू जो हारा कभी जीवन में तो हार उसी का है

सोचो नहीं अवगत कराती संसार से
न पालती न पोषती अपने अनन्य प्यार से
सिंचती न तेरे जीवन को अपने रक्त स्वेद से
परीचय कहाँ से होता तेरा भेद विभेद से

रही है कष्टों में बड़े प्रेम से पाला है
भूखी रही है खुद दिया तुझे निवाला है
विपदाओं से लड़ पड़ी है तेरी सुरक्षा में
न जाने कितनी बार तेरी आपदाओं को टाला है

है तेरी पहली शिक्षिका सबकुछ तुझे सिखाया है
ईश्वर ने अपना ही प्रतिरूप  " माँ " बनाया है
सोचिए विचारिये और फिर बताइए
क्या आपने भी सन्तान धर्म अच्छे से निभाया है?

हुई नहीं है देर अभी कुछ तो कर्तव्य निभालो
बैठो माँ के पैरों में अपना शीश झुकालो
बड़ा  मार्मिक सा होगा शायद कह भी न पाए हम
आज ही माता के लिए कुछ करने की ठानो 
                               – अमित पाठक शाकद्वीपी

Friday, April 29, 2022

जिंदगी की फितरत

है शाश्वत कुछ नहीं जग में
सबकुछ बदलना पड़ता है

कभी तेज दौड़नी होती है रेस
कभी देर तक ठहरना पड़ता है 

कभी बड़े अरमान से करते है कुछ
कभी कुछ बे मन से करना पड़ता है

कभी मिल जाते है कुछ अजीज लोग जीवन में
कभी एक शख्स की खातिर बोहोत तड़पना पड़ता है

मुस्कुराना पड़ता है कभी गम में
तो कभी ख़ुशी में भी आँसू आते है

कभी लोग देते है घाव बोहोत गहरा सा मन को
कभी लोग बड़े प्रेम से मरहम भी यहाँ लगाते है

कभी हासिल हो जाती है मंजिल चार ही कदम पर 
कभी मंजिल की तलाश में दर दर भटकना पड़ता है 

ये बातें नियत नहीं कुछ भी
फितरत है कि पल पल बदलना पड़ता है 

जीवन ऐसा ही 'अमित'
यहाँ स्वतः गिर कर सम्भलना पड़ता है 

               - अमित पाठक 'शाकद्वीपी'
                      (बोकारो , झारखण्ड)
                सम्पर्क सूत्र : 09304444946

Thursday, April 21, 2022

नर्स – हमरूह प्रकाशन में प्रकाशित

त्याग की है मूर्ति 
समर्पण का श्रृंगार है
श्वेत वस्त्र में मानो
'नर्स' देवी का अवतार है

विपदा की विकट समस्या थी
देश कितना परेशान था
कोई बचालो कोई सम्भालो
जग का ऐसा आह्वान था

सेवा धर्म की रक्षा में उसने 
न जाने कितने बलिदान दिए
अपनी चिंता को भूल कर
कइयों को जीवन दान दिए

रखा अडिग विश्वास स्वयं पर 
सबको हिम्मत से बांधा है
मातृत्व भरा हृदय है कोमल
पर कितना दृढ़ उसका कंधा है

लिया संकल्प की डटी रहूंगी 
चाहे जान भी बारुंगी
जब तक सीने में श्वास प्रबल है
मैं हिम्मत नहीं हारूँगी

दुबके थे सब अपने घरों में 
कैसा संक्रमण का प्रहार था
योद्धा बन कर युद्ध भी जीती
सेवा सुश्रुषा ही तलवार था

करुणा मन में रख कर उसने
सबका ही देखभाल किया
ढाल बन कर डटी रही 
जब जब कोरोना विकराल हुआ

अथक परिश्रम के बल पर 
जब किसी का जीवन बचाया है 
आत्मसंतोष की भाव ने 
उसका सुंदर मुख सजाया है

देते है सभी बधाई डॉक्टरों को
आप ईश्वर के रूप को
कैसे भूल जाये नर्स जी आपको
आप देवी का स्वरूप हो 

शब्दो का सुमन अर्पित
कहो कैसे गुणगान करू
अंतःकरण है द्रवित हमारा
मैं तेरा सम्मान करू

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        - अमित पाठक शाकद्वीपी 
              बोकारो , झारखण्ड




Sunday, April 17, 2022

पिता का साया




पिता का साया
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*कैसे लिखोगे शब्दो में पिता के अभाव को*
*कोई मरहम नहीं है जो भर दे इस घाव को*

*सहोगे जो अकेले जिम्मेदारियों के बोझ को*
*शायद तब समझ सको पिता के प्रभाव को*

*याद आने पर छलकेंगे आँसू स्वतः ही*
*उन बिन कौन खेवेगा जीवन नाव को*

*व्यथा अपनी अपने आप में सहते हैं*
*तुम कैसे बर्दाश्त करोगे समाज के दबाव को*

*जाने पर उनकी होगी तस्वीर का तो सहारा*
*पर तरसोगे मुझ सा उनकी आवाज को*

*सामने भाई बहन माँ को दोगे हौसला*
*पर अकेले में करोगे प्रार्थना भगवान से*
*कि प्रभु ऐसा कभी भी न किसी के साथ हो*

*रहे उम्र भर 'पिता का साया' सब पर*
*पिता को भी पुत्र पर हमेशा विश्वास हो*

      *- अमित पाठक शाकद्वीपी* 
       *(बोकारो , झारखण्ड)*

Saturday, April 9, 2022

श्री राम चरित

हैं देवो के भी वन्दनीय , विष्णु के अवतार हैं,
उनकी कृपा प्रभाव से टिका हुआ संसार है ।

दशरथ नन्दन के भाल पर चन्दन शोभायमान है,
दसों दिशाओं में हो रहा उनका ही गुणगान है ।

हर लिए जिनके चरण कमल ने शिला के विपत्ति घाव को,
शब्दों में लिखना कठिन है  मेरे राम के स्वभाव को ।

जटायु पक्षिराज उनका नाम ले कर तर गया,
थी भक्ति भावना प्रबल जो प्राण तक न्यौछावर किया ।

कर में धनुष धार कर अनेक शत्रु संहार किए,
मुनियों की यज्ञ की रक्षा में सिंहासन भी वार दिए ।

पिता के वचन के लिए था राज पाट त्याग दिया,
वचन की क्या महत्ता है जग को ऐसा आभास दिया ।

मृदुभाषी सरलतम मन में न कोई द्वेष था,
निकल पड़े जो वन में तो वनवासीयों सा ही भेष था ।

जाति भेद है गलत उनकी सबसे पहली यही सिख रही,
शबरी के प्रेम भाव वश थे जूठे बेर तक चखी ।

आनन्द विनोद था न वन में केवल विषाद था,
गंगा पार कराने को उनको खड़ा एक निषाद था ।

वनचर के बीच रहे तो नियति भी कठोर रही,
मृग की माया के कारण माता सीता खो गई ।

था एक अहंकारी ने माता सीता को हर लिया,
विपदा के ऐसे पल में कपियों ने बड़ा साथ दिया ।

अंततः विजय हुई सबके सहयोग से,
सीता को पुनः पा लिया अनन्य प्रेम योग से

विश्व के आधार ऐसे मेरे श्री राम है,
मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम से धन्य धरती धाम है ।

जगत के तम को हर ले ऐसे दिवाकर है वो,
क्षमा करना हे नाथ तुम हुई जो कोई भूल हो।

       -: श्री राम चरण को समर्पित :-
           - ✍️ अमित पाठक शाकद्वीपी

Monday, August 23, 2021

कर्ण – मन्तव्य में प्रकाशित

लिखूं कुछ आज मैं लेखनी जो मेरा साथ दे,
संभालना अश्रु को अपने मेरे लिखे बात पे।

इतिहास हो गई जो घटना आज उसे बतलाता हूँ ,
कर्ण की पीड़ा से तुझे अवगत करवाता हूँ।

जन्म दिया जिस माँ ने उसने ही उसे त्याग दिया,
विधि है निष्ठुर यहाँ ऐसा जो उसे भाग्य दिया। 

पाला एक सुत ने जिसे वो सूरज का अंश था,
था वो भी ऊँची गोत्र का क्षत्रिय का वंश था।

आया समय जो ज्ञान का तो गुरू की उसने खोज की,
शस्त्र शास्त्र के जगत में उनदिनों गुरू द्रोण की ही ओज थी।

ठुकरा दिया गुरू ने उसको वर्ण के आधार पर,
नियति शर्मशार हुई नहीं अपने यूँ प्रहार पर।

किया फिर भी ज्ञान अर्जन अंततः परशुराम से,
पहचान भी मिली तो दुर्योधन के नाम से।

यथार्थ तो है यही वह अर्जुन से बड़ा वीर था,
"सबने त्याग दिया मुझे" उसे इस बात का ही पीर था।

रणभूमि में था सामना अर्जुन से शत्रु रूप  में जब,
माता के वचनों से बंधा था कुंती पुत्र तब।

चाहता तो छोड़ देता माता के वाक्य को,
जैसे छोड़ा था माँ ने गंगा में अपने लाल को।

छल कर के देवो ने जिससे कवच कुंडल दान लिए,
इंसानों की युद्ध ईश्वर लडे तो नीति कैसे मान लिए।

अभागा था , पिता भी जिसका तम नहीं हर पाए,
छिप गए बादल के मध्य , पुत्र मरता है तो मर जाए।

सारा जीवन इस तरह का श्राप था बना रहा,
बेचारा कर्ण माँ बाप गुरू का कहाँ सगा रहा ?
                                  - अमित पाठक

आशाओं के अंकुर

कागा जैसा रूप मिला,  और वाणी जैसे दादुर। पर अपनी मस्ती में  रहते वीर बहादुर।। इक इक कर सब साथ छूट गए, होते गये सभी दूर। अनगिनत च...