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Wednesday, November 26, 2025

मंगल अभिषेक

गणाधिपो भानु-शशी-धरासुतो बुधो गुरुर्भार्गवसूर्यनन्दनाः ।
राहुश्च केतुश्च परं नवग्रहाः कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ १॥

उपेन्द्र इन्द्रो वरुणो हुताशनस्त्रिविक्रमो भानुसखश्चतुर्भुजः ।
गन्धर्व-यक्षोरग-सिद्ध-चारणाः कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ २॥

नलो दधीचिः सगरः पुरूरवा शाकुन्तलेयो भरतो धनञ्जयः ।
रामत्रयं वैन्यबली युधिष्ठिरः कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ ३॥

मनु-र्मरीचि-र्भृगु-दक्ष-नारदाः पाराशरो व्यास-वसिष्ठ-भार्गवाः ।
वाल्मीकि-कुम्भोद्भव-गर्ग-गौतमाः कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ ४॥

रम्भाशची सत्यवती च देवकी गौरी च लक्ष्मीश्च दितिश्च रुक्मिणी ।
कूर्मो गजेन्द्रः सचराऽचरा धरा कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ ५॥

गङ्गा च क्षिप्रा यमुना सरस्वती गोदावरी नेत्रवती च नर्मदा ।
सा चन्द्रभागा वरुणा त्वसी नदी कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ ६॥

तुङ्ग-प्रभासो गुरुचक्रपुष्करं गया विमुक्ता बदरी वटेश्वरः ।
केदार-पम्पासरसश्च नैमिषं कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ ७॥

शङ्खश्च दूर्वासित-पत्र-चामरं मणि प्रदीपो वररत्नकाञ्चनम् ।
सम्पूर्णकुम्भः सुहृतो हुताशनः कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥ ८॥

प्रयाणकाले यदि वा सुमङ्गले प्रभातकाले च नृपाभिषेचने ।
धर्मार्थकामाय जयाय भाषित व्यासेन कुर्यात्तु मनोरथं हि तत् ॥ ९॥

इति व्यासकृतं मङ्गलस्तोत्रं समाप्तम् ।

मनोरथाष्टकम्

सीता राम विवाह पंचमी

श्री सीता राम विवाह पंचमी
सीता सुकुमारी – अवध बिहारी, 
आज बंधे इक डोर से।
हर्षित नर नारी, सृष्टि सारी, 
होते भाव विभोर से।।

स्वयंवर को आए रघुराई,
सहज भाव लिऐ धनुष उठाई।
प्रेम पथ के आरोहण को 
खींचे डोर फिर ज्यारोपण को।।

खींचत ही जब शिव धनु टूटा,
विदेह राज का संताप भी छूटा।
दमक उठी उस पल यूं दामिनी,
भूमि पर हो आ गई चांदनी।।

परशुराम तत्क्षण जा पहुंचे,
धनु तोड़न का कारण पूछे।
ज्ञात हुई जो सारी कहानी,
दिए आशीष मुनि बड़ ज्ञानी।

नेह रंग में रंगी वैदेही, 
करे परिहास सखी सनेही।
नारायणी भी श्रीनिधि होके, 
हिय के भाव हिय में रोके।।

प्रभु जी श्यामल श्यामल सोहे, 
जनकसुता के मन को मोहे।
जयतु जयतु जय मातु जानकी, 
अतिशय प्रिय करूणानिधान की।।

मंगल सी यह बेला पावन,
जनकपुर को अति मनभावन।
स्वयं प्रभु जो बने जमाई, 
संग सिया के ब्याह रचाई।।

जन जन का यूं हृदय था हर्षा,
होने लगी पुष्पों की वर्षा।
नयन कमल भी मोती लुटायें,
लोग नगर के नाचे गायें।।

क्या ही वर्णन आज करूं,
प्रभु मैं परिणय रास का,
उत्सव प्रीत पुनीत का,
यह अटूट प्रेम आभास का।

– अमित पाठक शाकद्वीपी

Tuesday, November 25, 2025

अमित पाठक शाकद्वीपी उपमा अलंकार

जिसकी उपमा होती नहीं, 
जो है असीम अथाह, 
उसी अनंत अर्णव सरिस ही 
अपना भी रहा प्रवाह।

थोड़े से में मन न माने, 
अपनी अनुपम चाह,
कम से बेहतर कुछ न मिले तो, 
बेहतर हो निर्वाह।।

शाकद्वीपी सूर्य अंश से, 
उदयमान यह सृष्टि, 
सूरज सा ही तेज प्रबल है, 
देख मिला कर दृष्टि।

अपने तम से खुद जल बैठा, 
स्वयं स्वयं की ऋष्टि,
मन की वह्नि को शिथिल जो कर दे, 
ढूंढूं ऐसी वृष्टि।

– अमित पाठक शाकद्वीपी 

Thursday, November 20, 2025

सपनों का वह गांव सुहाना

सपनों का वह गांव सुहाना, 
जहां रहते थे नानी नाना।
होता था कभी आना जाना,
गर्मी छुट्टी में समय बिताना।।

चारपाई एक द्वार पड़ी थी,
नाना की साइकिल खड़ी थी।
बाहर आम का सुंदर उपवन,
खेतों में खलिहान सुहावन।।

हर पल मस्ती, रहते थे हँसते,
कच्चे घर के वो पक्के रिश्ते।
गुड़ की महक से हवा भी महके,
बुलबुल, मोर, कोयलिया चहके।।

पगडंडी से आते जाते,
मिट्टी से थे तन को सजाते।
पीते थे मटके का पानी,
क्या ही पल ये यार सुहानी।।

अब तो ये समय जा बदला,
बदल गई कहानी।
नानी नाना दोनों गुजरे,
गुजरी याद पुरानी।।

गांव बन कर शहर जा उभरा, 
पक्के छत अब, खोया खपरा।
पक्की सड़के घर को छूती,
मॉल गया बन घर के पिछोती।।

गांव गांव अब शहर से बढ़कर,
सबके घर पे बिजली, मोटर।
सबके ठौर ठिकाने बदले,
जब से नए जमाने बदले।।

अब तो नदियों पर भी दिखते नहीं हैं नाव।
लगता है कि खो सा गया है सपनो वाला गांव।।

– अमित पाठक शाकद्वीपी 


Wednesday, November 19, 2025

सुहानी सुबह


उदित हुए जब देव दिवाकर,
छट से गए सब तिमिर निशाचर।
ओस पर्ण के वाष्पित हो गए,
ज्यों आई ये किरण धरा पर।।

हमने भी तब आलस त्यागे,
फिरने लगे सब भागे भागे।
सबके तन में फुर्ती जागी,
दुनिया सारी काम में लागी।।

देख गगन की सुंदर आभा,
पक्षी गण का शोर शराबा।
सुहानी सुबह की ताजी हवाएं,
हरे भरे उपवन महकाए।।

हाथ लिए मैं चाय की प्याली,
देखूं ये अद्भुत हरियाली।
कुदरत के नैसर्गिक सुख को,
रचना में मैंने लिख डाली।।

उड़े गगन में खग अनुरागी,
तकती जाऊं बस मैं वैरागी।
खुद को खुद ही डांट लगाऊं,
पहले क्यों न इस पल जागी,

प्रभु की सुंदर सृष्टि देखूं 
मन ही मन मुस्काऊं 
देख देख मैं सुबह सुहानी,
फुले नहीं समाऊं।।
       – अमित पाठक शाकद्वीपी 

व्याकुल सी जब राधिके

व्याकुल सी जब राधिके चाहे कुछ आराम,  सेज नहीं, न आसन भाये, चाहे केवल श्याम। कांधे पर जब शीश धरे, तब मन को हो विश्राम, प्रीत मीत ...