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Saturday, April 26, 2025

श्री मदन मुरारी कृष्ण

उनके मुख की ज्योति जस ज्योति,
अनुपम रूप क्या उपमा होती।

उनका पानी जैसे पानी,
मंद मृदुल मुस्कान सुहानी।

वाणी जैसे शहद अधर पर,
सुनना चाहूं ठहर ठहर कर।

कृष्ण कृष्ण सम कृष्ण रहें हो,
तन की शोभा चंद्र बदन ज्यों।

हाथों में ले मधुर मुरलिया,
लट घुंघराले जैसे बदरिया।

© अमित पाठक शाकद्वीपी 

अद्भुत भोर सुहानी।

सूरज की किरणों से शोभित, 
अनुपम दिन का चेहरा,
मधुर मनोहर मृदुल मनोरम, 
उन दृश्यों का पहरा।

शीतल मंद पवन का झोंका, 
बाँधे है तन, मन को रोका,
हरीयाली जब दृष्टि खींचे,
चल दूं मैं भी आँखें मिचे।

बहती सी धारा का सौरभ,
चहचहाती पंछियों का कलरव,
सुन सुन कर यह ध्वनि लुभानी,
हर्षित होते हैं सब प्राणी।

खेतों में फसलें मुस्काए,
कहीं समीर जो अंक लगाए,
शुद्ध स्वच्छ सौंदर्य सुहावन,
सबको लगते हैं मनभावन।

मन को खो कर आँखें मूंदे,
सुमन सुमन पर ओस की बूंदें,
धन्य धरा की रुत मस्तानी,
सच में अद्भुत भोर सुहानी।

© अमित पाठक शाकद्वीपी 

आतंकी हमला

आतंकी हमला 
न भय किसी बात की, 
न सही गलत का फरक है।
वाहियात सी सोच है 
और बस दहशत की समझ है।।

किसने समझा दिया,
कि बेगुनाहों को मारो।
जन्नत है इसी में, 
यही तो जीने का सबब है।।

मूर्ख कुछ लोगो को मिलती है, 
नसीहत ये कैसी?
बन बैठते हैं दरिंदे, 
हरकतें इनकी वहशी।।

मन में इनके क्यों,
कोई प्रेम का पुष्प नहीं खिलता।
नफ़रत क्यों है इनको इतनी,
आतंकी हमलों से क्या ही भला मिलता।।

© अमित पाठक शाकद्वीपी 

Monday, April 7, 2025

श्रृंगार रस आधारित सृजन


काले काले नागिन जैसे, 
ये कुंतल के जाल,
देख के उनको वश में रहना, 
प्यारे है मोहाल।।

फुदक फुदक कर चलती है, 
ज्यों चले मोरनी चाल,
नैन कटारी, तन सुकुमारी, 
गोरे गोरे गाल।।

लगे चांदनी उतरी धरा पर, 
करके दिव्य श्रृंगार,
अधरन पर मुस्कान सजाया, 
बिंदी सजी लीलार।।

कानों में कुंडल झलकाया, 
गल मोतियन के हार,
शोभा ऐसी जाय न बरनी, 
कोशिश करूं अपार।।

© अमित पाठक शाकद्वीपी 

Friday, April 4, 2025

तोटक छंद आधारित सृजन (112 112 112 112)

प्रश्न 
किनके तन पे, किनके मन पे,
प्रभु पूजन की सुमनें पनपे।
जब नेह नहीं फिर बेमन से,
उनको भजते रहते प्रण से ?

उत्तर 
तन पे उनके, मन पे उनके,
प्रभु पूजन की सुमनें पनपे।
जब नेह किया इस जीवन से,
प्रभु को भजते रहते मन से।।

प्रश्न 
फिर भी न हुआ, कुछ भी मन का,
इनका उनका न किसी जन का।
प्रभु ने न दिया तुझ को मन से,
जिनको भजते रहते मन से।।

उत्तर 
मिलने भर की यह चाह नहीं,
प्रभु जी तक ही यह राह रही।
प्रभु जी निज धाम मिला जबसे,
सब सौंप दिया उनको तबसे।। 

© अमित पाठक शाकद्वीपी 

Thursday, April 3, 2025

जय श्री श्याम प्रभु

राधा के मन यूँ बंधे,
ज्यों बाँधे कोई डोर।
नेह प्रीत अनंत प्रभु,
दिखता न कोई छोर।।

मोहन तेरे मोह मगन,
पशु पक्षी आकाश गगन।
मुझ राधा को वश में करता,
कान्हा तेरा कृष्ण वर्ण।।

मंद मंद मुस्कान मनोहर,
मोर पंख मस्तक के ऊपर।
मुख की शोभा सूरज सम सुंदर,
प्रभु बसते हैं कण कण अंदर।।

नैनों से नूतन जादू सा डाला,
गल बीच शोभित वनमाला।
क्या गोपी क्या क्या गोप ग्वाल जी,
सभे निहारत नंदलाल जी।।

प्रेम सुधा भी प्रतिपल बरसे,
मन ही मन में हर जन हरसे।
हे नाथ हे जग के नायक,
दुःख हर्ता जन जन सुखदायक।।

राधे कृष्ण की युगल छवि का 
अद्भुत मिला आनंद।
जय जय वृषभान दुलारी
जय हो सच्चिदानंद। 

© अमित पाठक शाकद्वीपी 

आशाओं के अंकुर

कागा जैसा रूप मिला,  और वाणी जैसे दादुर। पर अपनी मस्ती में  रहते वीर बहादुर।। इक इक कर सब साथ छूट गए, होते गये सभी दूर। अनगिनत च...