THANK YOU FOR VISITING

THANK YOU FOR VISITING

Friday, December 22, 2023

ब्राह्मणों की महिमा

ब्राह्मण में ऐसा क्या है कि सारी
दुनिया ब्राह्मण के पीछे पड़ी है।
इसका उत्तर इस प्रकार है।

रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदासजी
ने लिखा है कि भगवान श्री राम जी ने श्री
परशुराम जी से कहा कि  →
"देव  एक  गुन  धनुष  हमारे।
 नौ गुन  परम  पुनीत तुम्हारे।।"

हे प्रभु हम क्षत्रिय हैं हमारे पास एक ही गुण
अर्थात धनुष ही है आप ब्राह्मण हैं आप में
परम पवित्र 9 गुण है-
ब्राह्मण_के_नौ_गुण :-
रिजुः तपस्वी सन्तोषी क्षमाशीलो जितेन्द्रियः।
दाता शूरो दयालुश्च ब्राह्मणो नवभिर्गुणैः।।

● रिजुः = सरल हो,
● तपस्वी = तप करनेवाला हो,
● संतोषी= मेहनत की कमाई पर  सन्तुष्ट,
रहनेवाला हो,
● क्षमाशीलो = क्षमा करनेवाला हो,
● जितेन्द्रियः = इन्द्रियों को वश में
रखनेवाला हो,
● दाता= दान करनेवाला हो,
● शूर = बहादुर हो,
● दयालुश्च= सब पर दया करनेवाला हो,
● ब्रह्मज्ञानी,
    
 
 श्रीमद् भगवत गीता के 18वें अध्याय
के 42श्लोक में भी ब्राह्मण के 9 गुण
इस प्रकार बताए गये हैं-

" शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्म कर्म स्वभावजम्।।"

अर्थात-मन का निग्रह करना ,इंद्रियों को वश
में करना,तप( धर्म पालन के लिए कष्ट सहना),
शौच(बाहर भीतर से शुद्ध रहना),क्षमा(दूसरों के
अपराध को क्षमा करना),आर्जवम्( शरीर,मन
आदि में सरलता रखना,वेद शास्त्र आदि का
ज्ञान होना,यज्ञ विधि को अनुभव में लाना
और परमात्मा वेद आदि में आस्तिक भाव
रखना यह सब ब्राह्मणों के स्वभाविक कर्म हैं।

पूर्व श्लोक में "स्वभावप्रभवैर्गुणै:
"कहा इसलिएस्वभावत कर्म बताया है।

स्वभाव बनने में जन्म मुख्य है।फिर जन्म के
बाद संग मुख्य है।संग स्वाध्याय,अभ्यास आदि
के कारण  स्वभाव में कर्म गुण बन जाता है।

दैवाधीनं  जगत सर्वं , मन्त्रा  धीनाश्च  देवता:। 
ते मंत्रा: ब्राह्मणा धीना: , तस्माद्  ब्राह्मण देवता:।। 

धिग्बलं क्षत्रिय बलं,ब्रह्म तेजो बलम बलम्।
एकेन ब्रह्म दण्डेन,सर्व शस्त्राणि हतानि च।। 

इस श्लोक में भी गुण से हारे हैं त्याग तपस्या
गायत्री सन्ध्या के बल से और आज लोग उसी
को त्यागते जा रहे हैं,और पुजवाने का भाव
जबरजस्ती रखे हुए हैं।

 *विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या।
 *वेदा: शाखा धर्मकर्माणि पत्रम् l।*
 *तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं।
 *छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम् ll*

भावार्थ --  वेदों का ज्ञाता और विद्वान ब्राह्मण
एक ऐसे वृक्ष के समान हैं जिसका मूल(जड़)
दिन के तीन विभागों प्रातः,मध्याह्न और सायं
सन्ध्याकाल के समय यह तीन सन्ध्या(गायत्री
मन्त्र का जप) करना है,चारों वेद उसकी
शाखायें हैं,तथा  वैदिक धर्म के  आचार
विचार का पालन करना उसके पत्तों के
समान हैं।

अतः प्रत्येक ब्राह्मण का यह कर्तव्य है कि,,
इस सन्ध्या रूपी मूल की यत्नपूर्वक रक्षा करें,
क्योंकि यदि मूल ही नष्ट हो जायेगा तो न तो
शाखायें बचेंगी और न पत्ते ही बचेंगे।। 

पुराणों में कहा गया है ---
विप्राणां यत्र पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता।

जिस स्थान पर ब्राह्मणों का पूजन हो वहाँ
देवता भी निवास करते हैं।
अन्यथा ब्राह्मणों के सम्मान के बिना देवालय
भी  शून्य हो जाते हैं। 
इसलिए .......
ब्राह्मणातिक्रमो नास्ति विप्रा वेद विवर्जिताः।।

 श्री कृष्ण ने कहा-ब्राह्मण यदि वेद से हीन भी हो,
तब पर भी उसका अपमान नही करना चाहिए।
क्योंकि  तुलसी का पत्ता क्या छोटा क्या बड़ा
वह हर अवस्था में  कल्याण ही करता है।

 ब्राह्मणोस्य मुखमासिद्......

वेदों ने कहा है की ब्राह्मण विराट पुरुष भगवान
के मुख में निवास करते हैं।
इनके मुख से निकले हर शब्द भगवान का ही
शब्द है, जैसा की स्वयं भगवान् ने कहा है कि,

विप्र प्रसादात् धरणी धरोहमम्।
विप्र प्रसादात् कमला वरोहम।
विप्र प्रसादात् अजिता जितोहम्।
विप्र प्रसादात् मम् राम नामम् ।।

 ब्राह्मणों के आशीर्वाद से ही मैंने
धरती को धारण कर रखा है।
अन्यथा इतना भार कोई अन्य पुरुष
कैसे उठा सकता है,इन्ही के आशीर्वाद
से नारायण हो कर मैंने लक्ष्मी को वरदान
में प्राप्त किया है,इन्ही के आशीर्वाद से मैं
हर युद्ध भी जीत गया और ब्राह्मणों के
आशीर्वाद से ही मेरा नाम राम अमर हुआ है,
अतः ब्राह्मण सर्व पूज्यनीय है।

और ब्राह्मणों काअपमान ही कलियुग
में पाप की वृद्धि का मुख्य कारण है।

प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें।।
हर हर महादेव शिव शंभू 🔱

💐राज 🙏🏻

#जय_सनातन⛳.
 #जय_ब्रह्मण_देव🚩🙏🏻

Sunday, October 29, 2023

प्रेम का असर

तुम जब आओगे
हम बातें हज़ार करेंगे
होठों से नही 
नैनो से यार करेंगे
बड़ा दिन हुआ 
नही देखा जी भर के तुझे 
इस बार मन भर दीदार करेंगे

ख़ुद की सीमाओं से मुक्त होकर
तुझमें समा जाऊं 
कहो आख़िर 
तेरे कितने करीब आऊं?

तुम सा ख़ूबसूरत नही देखा, 
जिसने तुम्हें नही देखा
उसने भला क्या देखा??

मैं अपनी बात रखने में हिचकिचाता नहीं हूं 
जैसा मैं हूं ही नहीं वैसा नजर आता नहीं हूं 
बनावटी असर से कोशो दूर हूं मैं 
मैं अपने दिल का तूझसे छिपाता नहीं हूं।

पूर्ण हो पुर्णिमा की चांद सी 
हो सरल भी मध्य रात सी 
सुकून जो घोल दे कानों में 
हैं खासियत तुम में ऐसे ही किसी बात सी।

किसी सुनसान सड़क पर एक बार मिलते 
बेफिक्र बेपनाह कभी तो यार मिलते 
मिलते ऐसे ही कि दिल को तलब हो 
यार ऐसे ही क्यों नहीं बार बार मिलते।
         – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Wednesday, October 18, 2023

है क्या ये प्रेम?

एक अगाध सी नदी की 
प्रचंड धार है,
है क्या ये प्रेम?
अद्वितीय संस्कार है, 
पतझड़ में भी बहार है।

दीप्त जैसे चंद्रमा 
और चांदनी की आस है,
है क्या ये प्रेम?
अटूट ये विश्वास है, 
अंधेरे में प्रकाश है।

बूंद बूंद सार्थक, अंश अंश जागृत
पीड़ा मन के हर ले इसमें औषधि का वास है,
है क्या ये प्रेम?
है सहयोग की ये भावना,
अपनत्व का आभास है।

प्रेम के अनेकों रूप
अनेक इसके नाम हैं 
है क्या ये प्रेम?
किसी का विश्राम तो
किसी का आराम है
        – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Tuesday, October 17, 2023

नारी जीवन

सुनो कहता है कुछ अंतर्मन,
है बड़ा कठिन सा ये जीवन,
घनघोर उदासी इस मन में,
सब त्याग चलूं किसी वन में ।

क्यों ऐसा मुझको भाग्य दिया,
कि अपनो ने ही त्याग दिया,
आता है हर पल रोना भी,
क्या पाप है नारी होना भी ?

सारा जीवन त्रुटिपूर्ण रहा,
हंस हंस सारा तंज सहा,
सारी उम्मीदें व्यर्थ रही,
हर क्षण हाजिर रहने की शर्त रही।

कभी मुझको देवी कहते हो,
कभी भक्षण करने को तकते हों,
कभी मान दिया नहीं कर्मो का,
बस ज्ञान दे रहे धर्मों का।

ग्रंथो में मैं गीता जैसी,
हल के नीचे सीता जैसी,
मैने ही सृजन किया सबकुछ,
है सहनशीलता भी अद्भुत।

न चाह रही कुछ दान करो,
बस हमारा भी सम्मान करो,
हाथों में तेरे हाथ किया,
हमनें भी तेरा साथ दिया ।

उन कर्तव्यों का ध्यान रहे,
उन कर्मो का गुणगान रहे
क्यों चाहते हो चुप सहती रहूं,
बन प्रीत नदी सी बहती रहूं।

जब विकट रूप यलगार किया,
शत्रु का जब संहार किया,
बन कर दुर्गा जब जाग गई,
सारी विपदा तब भाग गई।

अब बस इतनी सी चाहत है,
सम्मान मिले तो राहत है,
वरना सब वैसे का वैसा है,
मत पूछो जीवन कैसा है
ये नारी जीवन कैसा है।
        – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Sunday, October 8, 2023

खयाल तेरा है

ख्याल तेरा है*
**********************
मेरे दिल के किसी कोने में ख्याल तेरा है 
जो हाल है तेरा वही अब हाल मेरा है 
रहते हो कहां गुम ये जो सवाल मेरा है 
तेरा दिल ही तो ठिकाना है जबाव तेरा है 
मेरे दिल के किसी कोने में ख्याल तेरा है ।

न हाल जानते हो, न करते हो बातें हमसे 
कहो आख़िर कहां ध्यान तेरा है 
तेरी कही मानती हूं हर पल मैं 
कहो कथनों का कहां भला कोई मान मेरा है 
झूठ है बिलकुल कि ख्याल मेरा है।।

तेरी यादों में गुजरी राते 
सारा दिन तूझे याद किया 
अंधेरे में छवि तेरी 
तू ही मेरा सवेरा है
हमेशा मेरे दिल के किसी कोने में ख्याल तेरा है ।। 

कहती हैं कि बातों से अकसर मन जीत लेते हो 
लाखों में करोड़ो में एक यार मेरा है 
मिल जाए कोई मन का तो हो रोशनी जीवन में 
कोई अजीज खो जाएं तो उन बीन सब अंधेरा है 
सिर्फ इन दिनों दिल में तेरी यादों का बसेरा है । । 
– अमित पाठक शाकद्वीपी

मैं मौन ही अच्छा हूं

मैं मौन ही अच्छा हूं,
यहां लोग व्यर्थ बोलते हैं।
आपकी तस्वीर से लोग
यहां व्यक्तित्व तौलते हैं।

क्या है यही वो ?
समाज का हिस्सा,
जहां भेड़ चाल में
लोग मस्त दौड़ते हैं।

सिंहासन पर विराजमान
बड़े बेअदब से लोग,
गलत को सींचते है यहां
सही का वृक्ष तोड़ते हैं।

कदर न भाव की तेरी,
न शब्दों की ही जय है ,
हो सूरत गर अच्छी
सब तेरी ओर दौड़ते हैं।

किसी के ऐब को 
किसी का गुण बताते हो,
लोग ऐसे नहीं बिल्कुल
जैसे नज़र ये आते हैं।

सामने कहने की जिनमें
हिम्मत नहीं होती,
वैसे ही लोग अक्सर
पीछे कुछ बोल जाते हैं।

साहित्य यूं ही नहीं है
भाव अभिव्यक्ति,
मौन मुद्रा में भी
कलम से सब बताते हैं।

दोहरी भूमिका निभाने में
बड़े मग्न हैं जी सब,
चुगली पीठ पिछे कर
मुख पर मुस्कुराते हैं।

क्यों मर गई तेरी भावना मन की ?
क्यों आरंभ की तुने अवमानना जन की 
मिलो हमसे किसी गंगा के घाट पर
लिए हाथों में गंगाजल करु शुद्धि तेरे अवगुण की 
       – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Wednesday, October 4, 2023

किस्सा 3

दुर्गेश जी की कहानी

आशाओं के अंकुर

कागा जैसा रूप मिला,  और वाणी जैसे दादुर। पर अपनी मस्ती में  रहते वीर बहादुर।। इक इक कर सब साथ छूट गए, होते गये सभी दूर। अनगिनत च...