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Sunday, October 8, 2023

मैं मौन ही अच्छा हूं

मैं मौन ही अच्छा हूं,
यहां लोग व्यर्थ बोलते हैं।
आपकी तस्वीर से लोग
यहां व्यक्तित्व तौलते हैं।

क्या है यही वो ?
समाज का हिस्सा,
जहां भेड़ चाल में
लोग मस्त दौड़ते हैं।

सिंहासन पर विराजमान
बड़े बेअदब से लोग,
गलत को सींचते है यहां
सही का वृक्ष तोड़ते हैं।

कदर न भाव की तेरी,
न शब्दों की ही जय है ,
हो सूरत गर अच्छी
सब तेरी ओर दौड़ते हैं।

किसी के ऐब को 
किसी का गुण बताते हो,
लोग ऐसे नहीं बिल्कुल
जैसे नज़र ये आते हैं।

सामने कहने की जिनमें
हिम्मत नहीं होती,
वैसे ही लोग अक्सर
पीछे कुछ बोल जाते हैं।

साहित्य यूं ही नहीं है
भाव अभिव्यक्ति,
मौन मुद्रा में भी
कलम से सब बताते हैं।

दोहरी भूमिका निभाने में
बड़े मग्न हैं जी सब,
चुगली पीठ पिछे कर
मुख पर मुस्कुराते हैं।

क्यों मर गई तेरी भावना मन की ?
क्यों आरंभ की तुने अवमानना जन की 
मिलो हमसे किसी गंगा के घाट पर
लिए हाथों में गंगाजल करु शुद्धि तेरे अवगुण की 
       – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Wednesday, October 4, 2023

किस्सा 3

दुर्गेश जी की कहानी

Monday, September 25, 2023

क्या करें??

क्या करें??
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विकृत होती है मानसिकता 
सोच घिनौनी होती है 
बढ़ा के हाथ सहारे का 
फिर वही शख्स दबोचे तो क्या करें?

ये शहर किस ओर जा रहा है?
सड़क पर खड़ा बुड्ढा भी
आधी उम्र की बहु बेटियों को है निहारे
कहो ऐसी नज़र का क्या करें?

कुछ लोग बड़े बेचैन है जानें क्यों?
बेवजह पिछे पड़े रहते हो किसी के
कौन सा है ये घटिया हुनर
 कहो इस हुनर का क्या करें?

इंसानी खाल में भेड़ियों सी ये हरकतें
कोई इन हरकतों से साथ क्यों गुजर बसर करे
नुमाइश कर रहे हो, है चरित्र का चीरहरण ये
कोई जान कर आपकी विकृति क्यों आपका कदर करें।
                  – अमित पाठक शाकद्वीपी

Monday, August 28, 2023

पछतावा

थे अरमान दिल के हम भी रेस में अव्वल रहे
मगर न जानें कब रास्ता बदल गया ।
बड़ी मुश्किल से हासिल की थी एक अच्छी सख्शियत  अपनी
उम्र के एक दौर ने वो रूतबा निगल लिया।।

ख्वाहिशें हाथ से रेत की तरह पिछली
कुछ भी न ठहरा सारा ही निकल गया।
न तपीस है न उजाला ही है जीवन में
मेरे हिस्से का तो मानो सूरज ही ढल गया।।

बड़े लोगो में गिनती होती है उनकी
उनको देखकर जो खुद को देखा मेरा दिल दहल गया।
सड़क पर उनको आते देखा तो
मैं खुद ही खुद राह बदल कर निकल गया।।

अब न आरजू है न तमन्ना है कोई
अमित गिरते गिरते पर संभल गया।
समझो सबको सबकुछ नहीं मिलता 
मेरी किस्मत में विधि का ऐसा ही कलम चल गया।।
                        – अमित पाठक शाकद्वीपी 


Sunday, August 20, 2023

गणेश वंदना



गणेश वंदना
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जय गणपति जय गिरिजा नंदन,
मूषक वाहन असुर निकंदन,
वक्रतुंड शुचि सूंड सुहावन,
मंगल मूर्ति जय पाप नशावन।

जय गणेश जय जय गणनायक,
आदि देव जय सब सुख दायक,
भाल चंद्र जय जय गजकर्णक,
सुमुख सुरेश जय विघ्न विनाशक।

दुर्वा दल श्रृंगार तुम्हारा,
पान फूल लगे कितना प्यारा,
एकदंत दयावंत कहाते,
विकट विनायक सबके मन भाते।

जय जय हे सिद्धि बुद्धि के दाता,
जय महेश जय पार्वती माता,
सुंदर शोभा अद्भुत तन की
आन हरो अब विपदा जन की।

देते सबको वर मन अभिलाषित,
तुमसे सृष्टि है परिभाषित,
शब्द शब्द मैं महिमा गाऊं,
चरण कमल में भाव चढ़ाऊं।

दास अमित की वंदना, करना प्रभु स्वीकार,
साष्टांग दंडवत नमन करते बारंबार।।
               – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Monday, July 31, 2023

शिव पार्वती प्रसंग : मां पार्वती धन्य हुई, महादेव सा वर पाकर।

मां पार्वती धन्य हुई, महादेव सा वर पाकर।
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बाल्य काल में तप के बल शिव जी से वर ये पाया था।
भूखे प्यासे कर के तपस्या उनके आसन को डगमगाया था।।
अड़ी रही कि उन बीन कोई न जीवन का मेरे आधार होगा ।
होने को बस वही होंगे सब , उनसे ही मेरा सोलह श्रृंगार होगा।।

डटी रही अपनी कथनी पर , शिव को सब समर्पण कर ।
रोम रोम में शिव को बसाया , शिव शिव जपते थे ये अधर ।।
घने वन मे बना कर कंद्रा करती शिव का पूजन ।
निराहार रही कभी , कभी किए कंद मूल फल भोजन।।

समय परम प्रबल और पावन , आया जब सर्वेश । 
लेने को फिर प्रेम परीक्षा आए स्वयं महेश।।
बोले प्रसन्न हूं वर मांगो कोई नेक ।
बोलीं पार्वती यूं हंसकर, है मन में भाव अनेक ।।

फिर सबसे बड़ी यह इच्छा आप संग हो यूं योग।
पति रूप में आन मिलो तो अद्भुत हों संयोग।
हर्षित मन से शिव शंकर ने दिए मन अभिलाषित वर ।
धन्य हो गई माता पार्वती महादेव को पाकर, उनसे ब्याह रचाकर ।।
                      – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Monday, July 17, 2023

शिव वंदना

#मनहरण घनाक्षरी
# विश्वनाथ वंदना 
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जय देव दिवाकर , मणि ताज सुधाकर
तन भस्म रमाकर, धरणीधर गहे ।

सर्प हार बनाकर , मृग छाल सजाकर
गुरु देव दया कर , ह्रदय वास रहे।

भूषित छवि सुंदर , जय श्री करुणाकर
पूजे देव निशाचर , जटा से गंग बहे।

जय पशुपति शंकर , उमापति जै भूधर
अति रूप मनोहर ,  तिनहु लोक कहे।

©️✍️ अमित पाठक शाकद्वीपी 

क्षणे क्षणे कृतं पापं स्मरणेन विनश्यति।
पुस्तकं धारयेत् एही आरोग्य भयनाशनम् ।।

हर हर महादेव , जय शिव शम्भू 🙏

आशाओं के अंकुर

कागा जैसा रूप मिला,  और वाणी जैसे दादुर। पर अपनी मस्ती में  रहते वीर बहादुर।। इक इक कर सब साथ छूट गए, होते गये सभी दूर। अनगिनत च...