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Wednesday, February 15, 2023

रंगो से रंजिश


किस रंग में रंगे खुद को
सब बेरंग हो गए
बदलता रंग देखा उनका
हम दंग हो गए

रंग लाल मेरे पसन्द का
बस मलाल दे गया
लिबास लाल ही तो था
उन्हें कोई और ले गया

पीले रंग पर भी कहो 
क्या सवाल करूं ?
हल्दी की रस्म या 
दिल पर चोट की बात करूं 

हरा रंग भी अब 
हमें कहां भाता है ?
हराया किस्मत ने हमें 
ये याद दिलाता है

रंग हसीन सारे ही खो गए
रंग असलियत का देख कर गमगीन हो गए
समझाया खुद को बोहोत अकेले में
भीड़ में हम भी रंगीन हो गए

हर रंग से शिकायत है
हर रंग में है मस्ती प्रीत की
रंगा है जो खुद को नए रंग में तो समझा
विफलता के रंग के आगे है गुलाल भी जीत की
            – अमित पाठक शाकद्वीपी 

Thursday, January 5, 2023

इश्क की बात

लफ्जों में इश्क बयां करने की पहल थी
क्या कहूं उसे कविता थी या गज़ल थी ?
थी खूबसूरत बोहोत कैसे बताएं बोल कर ?
समझो तराशा हुआ कोई संगमरमर की महल थी 

जो पहले पहल देखा तो ठहर सा गया नजर था
साथ उसके खुशनुमा सा सफर था
अक्सर देखते थे उसको आते जाते
कुछ तो दूरी पर उसका भी घर था

इजहार करने में हुई थी भले देरी
राह तकती थी अक्सर वो भी मेरी
प्रीत की डोर में बंधे थे मन दोनो के
गली में उसके सुबह शाम लगाता था फेरी

बयां करते थे दोनो जज़्बात अपने दिल के
मुस्कुराहट आ ही जाती थी होठों पर उस से मिल के
दीदार को उनके खड़े रहते थे नुक्कड़ पर
खुशबू मन के बगीचे में बिखेर रहे थे पूष्प प्रेम के खिल के 

कभी न मिटने वाला वो पहले प्यार का किस्सा
उसके लिए सहेजे रखा है इश्क की किताब का एक हिस्सा
सोचो जरा तो अनोखे ये किस्से ।
हैं हम इनमे शामिल तो कभी हमारे ये हिस्से ।
                      ✍️ अमित पाठक शाकद्वीपी 


Saturday, December 3, 2022

अधूरा इश्क कोई

मेरे दिल के किसी कोने में ख्याल तेरा है
जो हाल है तेरा वही अब हाल मेरा है
रहते हो कहां गुम ये जो सवाल मेरा है
तेरा दिल ही तो ठिकाना है जबाव तेरा है
मेरे दिल के किसी कोने में ख्याल तेरा है ।।

न हाल जानते हो न करते हो बातें हमसे
कहो आख़िर कहां ध्यान तेरा है
तेरी कही मानती हूं हर पल मैं
कहो कथनों का कहां भला कोई मान मेरा है 
झूठ है बिलकुल कि ख्याल मेरा है।।

तेरी यादों में गुजरी राते
सारा दिन तूझे याद किया
अंधेरे में छवि तेरी
तू ही तो सवेरा है
हमेशा मेरे दिल के किसी कोने में ख्याल तेरा है ।।

कहती हैं कि बातों से अकसर मन जीत लेते हो
लाखों में करोड़ो में एक यार मेरा है 
मिल जाए कोई मन का तो हो रोशनी जीवन में
कोई अजीज खो जाएं तो उन बीन सब अंधेरा है
सिर्फ इन दिनों दिल में यादों का बसेरा है।।
                – अमित पाठक शाकद्वीपी 

उनसे इश्क़ करके – उनसे इश्क करके संकलन में प्रकाशित

उनसे इश्क़ करके सीखा एक राग है
उन्हीं एहसासों को कलमबद्ध करने की आग है
असर है उनका मेरे दिल पर गहरा
आप ही तय करें प्रेम चिह्न है कोई
या किसी दुर्घटना का दाग है 

आईए परिचय करते है प्रेम के उस रुप से
कड़ाके की ठंड में तपीस मिलती है जैसे धूप से 
थी न दिल में आरजू न ख्वाहिश ही कोई
उस दिन आई अचानक ही मेरे सामने फिर फूट फूट कर रोई

मैंने पूछा क्या हुआ तो जोर से चिल्लाई
रोते रोते ही अपनी आपबीती सुनाई
कहने लगी कि कोई उससे विश्वासघात कर गया
किया प्रेम का नाटक पर ब्याहने से उसको डर गया

देखा जब करीब से तो लगी अप्सरा मुझे
मैंने कहा कि कोई कैसे छोड़ सकता है तुझे
कद्र हीरे की सिर्फ जोहरी ही जानते हैं
बाकियों को क्या पता उसे बेकार पत्थर ही जानते हैं

हो कितनी सुंदर किया भी हसीं श्रृंगार है
मगर ऐसे ही झटपट कहता कैसे कि उनसे प्यार है
बातों ही बातों में दोस्ती की नीव रखी
थे और भी लोग वहां पर हमे तो बस वही दिखी

फिर एक दिन मौका मिला
तो बोल दिया था दिल में जो
इश्क़ उससे और जाहिर न हो उसको
ऐसा भला मैं क्यों करूं 

कहा – लफ्ज़ कुछ अनकहे से कहो तो बयां करूं 
हो आरजू अगर कुछ पुराने जज्बातों को नया करूं एक लफ्ज़ में कैसे जाहिर करूं प्यार क्या है ? 
तेरा नाम लिख दूं कि क्या करूं?

समझ गई प्रेम का रिश्ता जुड़ने को बेताब था 
कुछ दिन दोनों ने फिर मिलकर जोड़ा भी बहुत सा ख़्वाब था

कहने लगी तुम्हे पा कर आज गुलाब सी खिली हूं 
लग रहा है सदियों बाद खुद से मिली हूं
बातें खुल कर जो किया तुमसे 
बस उन्ही चंद घंटों में जिंदगी जी ली हूं

कुछ दिन तो यूं ही गुजरे हंसते हुए
फिर बिगड़ा मौहोल और दोनो के अलग रास्ते हुए

किसी का दिल तोड़ा किसी का आबाद किया
उसकी याद ने फिर सारा जीवन मेरा बर्बाद किया
पतन के गर्त में मैं ये प्रेम का ही तो परिणाम था
खुशी की वजह थी जो गम में भी उसका नाम था

यादों को उसकी कैसे बयां करूं
प्रेम गीत छोड़ कर मैं दर्द से दवा करूं
सुनो तेरी कमी का स्वाद ऐसा है जैसे बीना चीनी के चाय 
गर्माहट भरपूर है जिसमें पर दिल को कैसे भाय ?

पल बदल जाएं ऐसे रिश्तों का सहारा नहीं करते
अब हैं उनके शौक ऊंचे मेरी याद में वक्त वो गुजारा नहीं करते
सामने से भी गुजरते हैं तो इशारा नहीं करते 
भूल चुके हैं शायद नाम हमारा अब पुकारा नहीं करते
                   – अमित पाठक शाकद्वीपी 


 

ये नज़र नज़र की बात है – नज़र नज़र की बात मे प्रकाशित

ये नजर नजर की बात है 
कि किसे क्या तलाश है,
तू मिलती है फुरसत में 
मुझे हर पल तेरी आस है

ये नजर नजर की बात है 
कि किसे क्या तलाश है, 
तू हंसने को बेताब है, 
मुझे तेरी मुस्कुराहटों की ही प्यास हैं।

प्रेम केवल शब्द नहीं
प्रेम एक एहसास है
मेरा कुछ हिस्सा पास है तेरे 
कुछ तेरा मेरे पास है

कहती हैं फिर प्रियंवदा
मैंने बस इतना जाना है 
जीवन तो बस बहाना है 
इसमें कुछ मनचाहा खोना है 
या अनचाहा पाना है

अस्तित्व की तलाश में 
मैं आई थी तेरे पास मे
 उलझा दिया तुमने मुझे 
कुछ अधूरे काश में

है बात ये भी नजर की 
नजर लग गई है दिल्लगी को 
कभी समझा न मेरे प्रेम को
न मेरी खुशी को

तुम्हारी ओर जाता हर रास्ता अब कहता है ठहरो 
कि तेरी मंजिल का अब ये ठिकाना नहीं है 
आशिकी कैसी भी की हो तुमने 
जाहिर नहीं करना अब बताना नहीं है

नजर की ही तो बात है सारी
कभी साफ कभी धुंधला सा नजर आता है
भाव कभी बिन बोले जाहिर हो जाते हैं
 कभी बेबसी ऐसी की लब बोल नहीं पाता है

बुरी नजर जब पड़ती है किसी पर
फूलों की तरह इंसान भी मुरझाता
खिलता है कभी, कभी महकता है 
कभी टूट कर बिखर जाता है
                 – अमित पाठक शाकद्वीपी 


Tuesday, November 29, 2022

सरलता – काव्यांश संकलन में प्रकाशित

बड़ी सीधी सरल बड़ी सच्ची थी
मेरी कल्पना वास्तविकता से अच्छी थी

हमने सोचा था सबकुछ जैसे का तैसा हो
मगर सब पूछे जाते है जब पास पैसा हो

न चाहत न आरजू न तमन्ना किसी की
ज़िंदगी थी बेपरवाह जैसे धारा नदी की

मगर जीवन में सबकुछ सरल नहीं होता
कुछ ऐसी भी मुश्किलें होती है जिनका हल नहीं होता
कुछ लोग बस कर्म में है लगे हुए 
उनकी परिश्रम के लायक कोई फल नहीं होता

मैं किसी की सादगी पर कोई सवाल नहीं करता
लोग हद से ज्यादा भी सीधे मिले तो बवाल नहीं करता

कोई पूछे गर मेरी सरलता का राज , मुस्कुराता हूं
मैं अपने इस गुण को अनुवांशिक बताता हूं
सादगी ये जो मेरे चहरे पे छाई है
सुनो मेरा चहरा मेरे पापा की परछाई है 
उनकी छाया ही है छवि मेरी
सब सौगात है उनकी कुछ नहीं मेरी कमाई है 

सरल शब्दों में कुछ लोग बड़ी बात करते हैं
कुछ लोग कठोर बन किसी की सरलता पर घात करते हैं

कहीं सरलता कई आयाम गढ़ रहा है
कहीं ऐसी भी नौबत है अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है

सभी कहते हैं खुद को सरल सादा
मगर कहीं दिखावे की प्रवृति है , कहीं है दंभ ही ज्यादा

हो जैसे भी उसी में अव्वल बनो
दरिया आग का नहीं तुम पानी सा तरल बनो
कई लोग है क्रूर दुनिया में
नसीहत ये रहेगी मेरी तुम बस सरल बनो , तुम बस सरल बनो 
               – अमित पाठक शाकद्वीपी स्वरचित 

Sunday, November 27, 2022

एक ख्वाहिश

एक ख्वाहिश थी कि कहीं का कोई अधिकारी होता
मैं भी किसी दफ़्तर में बाबू सरकारी होता

सरकारी वर्दी में अपने तन पर भी निखार होता
होता कितना अच्छा अगर ये सपना साकार होता

कोशिशें हमने भी की पर हर बार विफल रहे
अब नाकामियाबी में बस उम्र ढल रहे

जिनकी नजरो में थे सितारे कभी हम
आज उन्ही को बोहोत खल रहे

है रास्ता कितना लम्बा मेरी मंजिल कब आएगी ?
सालो से बस चल रहें सो चल रहें 

ये भी हकीकत है कि योग्यता कम नहीं अपनी
कभी किस्मत से तो कभी सरकारी तरीकों पर भी है ठनी

पर कारण कोई भी फिर से ख़्वाब सजाया जायेगा
सच करने को सपने सारे फिर जोर लगाया जायेगा

तुम भी देखना गौर से उस उड़ान को
समाज में अपनी एक नई पहचान को

पी लो सारे गरल अपमान के 
चलो उठो और लगो फिर से कुछ ठान के

तेरी परिश्रम ही तेरी इस रण में सारथी होगी
बन कर आओ अधिकारी फिर खुले मन से तेरी आरती होगी
             – अमित पाठक शाकद्वीपी 
 

आशाओं के अंकुर

कागा जैसा रूप मिला,  और वाणी जैसे दादुर। पर अपनी मस्ती में  रहते वीर बहादुर।। इक इक कर सब साथ छूट गए, होते गये सभी दूर। अनगिनत च...