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Friday, June 24, 2022

आगामी संकलन - मन्तव्य

नमस्कार आदरणीय / आदरणीया , 
              हमारी नई संकलन 'मन्तव्य' हेतु काव्य रचनाएँ आमंत्रित है। रचना का विषय आपकी इच्छा अनुरूप हो जो पुस्तिका के नाम को सार्थक करे । रचना 16 से 20 पंक्तियों में सरल हिंदी भाषा में होनी आवश्यक है । काव्य पूर्णतः आपके द्वारा सृजित होनी चाहिए और अप्रकाशित हो। काव्य से किसी व्यक्ति या समुदाय विशेष को कोई हानि न हो इस लिए विशेष समुदाय या व्यक्ति को इंगित न करती हो । उक्त बातों का ध्यान रखते हुए रचनाएँ आप हमें व्हाट्सएप्प के माध्यम से टेक्स्ट के रूप में अपनी एक तस्वीर और स्वपरिचय के साथ भेजीए ।

* व्हाट्सएप्प नम्बर - 09304444946

* अंतिम तिथी - 5 जुलाई 2022

👉 ISBN : 978-93-5659-326-8

👉 रचनाएँ  400/- के सहयोग शुल्क के साथ आमंत्रित है जिसमे आपको भेजी जाने वाली पुस्तक का मूल्य , प्रमाण पत्र एवं डाक खर्च शामिल है। 

👉 प्रति व्यक्ति केवल 1 ही रचना स्वीकृत होगी ।

👉 पुस्तक मुद्रित हो जाने पर आपसे आपका पत्राचार पता माँगा जायेगा जिस पर आपको पुस्तिका भेजी जाएँगी । 

👉 पुस्तक के संकलन में कुल 1 माह तक का समय लगेगा तब तक आपको धैर्य रखना होगा ।

👉 यदि आपकी रचना स्वीकृत होती है तभी आपको उक्त शुल्क "फोन पे या गूगल पे" के माध्यम से भेजनी होगी अन्यथा नहीं । 

👉 रचना स्वीकृत होने पर आपको रचनाकारों के समूह में जोड़ा जाएगा जहाँ आपको पुस्तक की ईबुक कॉपी और डिजिटल सम्मान पत्र प्राप्त होंगे । 


© Amit Pathak Shakdweepi



Sunday, June 5, 2022

कब दर्शन दोगे गिरधारी , ढूंढ रही तुझे नयन हमारी

कब दर्शन दोगे गिरधारी ।
ढूंढ रही तुझे नयन हमारी ।।
राम रूप में यह जग तारा ।
प्रेम बरसाई बन कृष्ण मुरारी ।। १ ।।

विष्णु के अवतार निराले ।
रोग  कष्ट सब हरने वाले ।।
कैसे भक्ति करू बनवारी ।
किस विधि करू अरज तिहारी ।। २ ।।

मैं मूरख नादान पुजारी । 
जानू न भेद विधान तुम्हारी ।।
जन जन के कल्याण हो करते ।
हर लो प्रभु जी कष्ट हमारी ।। ३ ।।

दरस दिखा कर  कृपा करदो । 
सुख समृद्धि से जीवन भरदो ।।
आएंगे तेरे धाम को स्वामी ।
पूजेंगे मूरत हे अन्तर्यामी ।। ४ ।।

तूने सबकी विपदा टारि ।
कब आएं मुझ दीन की बारी ।।
कब दर्शन दोगे गिरधारी ।
ढूंढ रही तुझे नयन हमारी ।। ५  ।।
                 - स्वरचित अमित पाठक शाकद्वीपी
                          साहित्य संगम बुक्स 


Sunday, May 29, 2022

वट सावित्री कथा (काव्य रूपेण)


वट सावित्री कथा (काव्य रूपेण)
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मद्र देश में रहते थे राजा एक महान 
सदा दुखी रहते थे नहीं कोई संतान

माँ सावित्री को प्रसन्न किया 
किये व्रत जप तप दान 

माता के आशीष से हुई
प्रकट कन्या एक गुणवान

राजा के सामने विकट परिस्थिति एक
कन्या के लिए मिले कोई योग्य वर नेक

पिता कहते पुत्री से नहीं ज्ञात कर पा रहा कैसे करू तेरा विवाह
योग्य वर ढूंढ लो स्वयं जैसी तेरी चाह

आज्ञा लेकर वन गयी तो मिले पुरुष अति यशवान
सत्य का आचरण करे नाम था "सत्यवान"

पल भर में ही वशीभूत हुई न्यौछावर किया तन मन
पति रूप में सत्यवान का उसने किया वरण

उदार चरित सत्यवान के थे ऐसे भाग्य
एक वर्ष ही आयु शेष थे कर देगा फिर देहत्याग

विवाह के उपरांत रहें दोनों प्रेम में लीन
अंततः आयी घड़ी एक संगीन

यमराज स्वयं आये लेने उसके प्राण
सावित्री चल पड़ी मृत्यु मार्ग में पतिव्रत मन में ठान

पतिव्रता धर्म इतना प्रबल यमराज भी करें मान
हो कर प्रसन्न प्रभु ने भी दे दिया जीवनदान

सौभाग्य की रक्षा के लिए वट सावित्री व्रत 
कथा को पद्य रूप में लिखता हूँ सब सत्य

चाहे जो स्त्री सुख सौभाय और मान
विधिवत यह पूजन करें पतिव्रत मन में ठान 

श्री स्कंद पुराण अंतर्गत वटसावित्री व्रत कथा पद्य रूपेण सम्पूर्णं 
           - पं. अमित पाठक शाकद्वीपी

प्रेम

एक सुन्दर सख़्श से जुड़ गए दिल के तार
तन भी सुंदर मन भी सुंदर होने लगा था प्यार

खुश थे हम भी पा कर उनको जैसे 
हो ईश्वर का उपहार
सीधी सरल सहज रहती थी
न कोई साज श्रृंगार

धीरे धीरे बात बढ़ी होने लगा मिलाप
सबके मन को मोह ले उसका ऐसा था स्वाभाव

स्नेह प्रिति की डोर बंधी थी हमदोनों के बीच 
दोनों मिल कर प्रेम वृक्ष को ऐसे रहें थे सींच

जाने फिर क्या हुआ अचानक सबका बदला मन
छोड़ गए मुँह मोड़ गए लौट गए अपने वतन

आज भी जब जब हो अनुभव प्रेम का
आते उसके ख़्वाब 
असर कभी बेअसर न होगा
 प्रभाव कहो या दबाव

- अमित पाठक 'शाकद्वीपी'

Friday, May 20, 2022

बदलता स्वभाव

उम्मीद जगा कर
बोहोत गहरा वार करते हो
पहली बार है या 
हरबार करते हो

हो गई नादानी 
अब सुधार कैसे हो
हमको बुरा बना दिया 
तुम तो अब भी वैसे हो 

थोड़ी रियायतें भी जरुरी हैं
जब साथ चाहते हो
क्यों लोगों को भला 
बस कामगार समझतें हो

लोग जुड़ते है आपसे 
तो विश्वास जानकर
काम हो जाने पर 
क्यों रंग बदलते हो ?

दिखतें हो फोटो विडियो में 
बड़े सीधे सरल यूँ
गुस्सा बेवजह क्यों
फिर रखते हो ?

बात से ज्यादा 
हमे लहजा पसन्द है
कड़वे शब्द भी 
शालीनता से कहिये
बोलते हो तो लगता है 
आग उगलते हो 

छवि धूमिल हो रही है आपकी
परिष्करण जरूरी है 
कुछ बड़ा हासिल नहीं किया है
अभी भी उड़ान में दुरी है 
 

Thursday, May 19, 2022

प्रेम अनुभूति

एक सुन्दर सख़्श से जुड़ गए दिल के तार
तन भी सुंदर मन भी सुंदर होने लगा था प्यार

खुश थे हम भी पा कर उनको जैसे 
हो ईश्वर का उपहार
सीधी सरल सहज रहती थी
न कोई साज श्रृंगार

धीरे धीरे बात बढ़ी होने लगा मिलाप
सबके मन को मोह ले उसका ऐसा था स्वाभाव

स्नेह प्रिति की डोर बंधी थी हमदोनों के बीच 
दोनों मिल कर प्रेम वृक्ष को ऐसे रहें थे सींच

जाने फिर क्या हुआ अचानक सबका बदला मन
छोड़ गए मुँह मोड़ गए लौट गए अपने वतन

आज भी जब जब हो अनुभव प्रेम का
आते उसके ख़्वाब 
असर कभी बेअसर न होगा
 प्रभाव कहो या दबाव

- अमित पाठक 'शाकद्वीपी'
(सम्पर्क सूत्र : - 09304444946)

दिल के पन्नो पर – इंकलाब प्रकाशन में प्रकाशित

दिल के पन्नों पर
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दिल के पन्नो पर 
उसकी कहानी  लिखनी है
गुजारे थे जो हसीन पल साथ में 
यादें सारी वो सुहानी लिखनी है 

लिखनी है उसकी बातें 
चाशनी से भी मीठी
प्यारी हरकतों की 
नादानी लिखनी है 
दिल के पन्नो पर 
उसकी कहानी लिखनी है

मिले थे कैसे राह में 
हम दोनों एक दूसरे से
कैसे बढ़ी थी 
नजदीकियां हमारी
बातें सारी वो पुरानी लिखनी है
दिल के पन्नो पर 
उसकी कहानी लिखनी है

उसके दिल को लिखना है
आईना मेरे दिल का
उसे मेरा हमसफ़र 
मेरी दीवानी लिखनी है
दिल के पन्नो पर 
उसकी कहानी लिखनी है

सोचता हूँ क्या बात होती
जो जुड़ गए होते रिश्ते भी
उसके याद में बिखरें
आँसुओं की रवानी लिखनी है
दिल के पन्नो पर 
उसकी कहानी लिखनी है

  - अमित पाठक शाकद्वीपी
         बोकारो , झारखण्ड

आशाओं के अंकुर

कागा जैसा रूप मिला,  और वाणी जैसे दादुर। पर अपनी मस्ती में  रहते वीर बहादुर।। इक इक कर सब साथ छूट गए, होते गये सभी दूर। अनगिनत च...