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Wednesday, May 22, 2024
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शकुंतला दुष्यंत
कितना बेहतर जीवन था, दिन थे कितने गुलजार। उपवन बीच बसेरा अपना, पुष्पों की थी सजी बहार।। आए एकदिन राजकुंवर फिर करने को था रहा शिक...
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अप्रैल 2022, उन दिनों में मैं योर कोट नाम के एक ऐप पर छोटी-छोटी रचनाएं लिखा करता था। छोटी-छोटी मुक्तक लिखने के लिए यह एक अच्छा स...
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प्रेम पथिक की अभिलाषा का क्यों ऐसा उपहास किया, बार बार छलने को ही बस प्रयास किया। अनसुना कर गए बात और वादा भी कहां साकार है, निर्लज...
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साहित्य का ये कैसा दौर... (लेख) इन दिनों साहित्य ऐसे दौर से हो कर गुजर रहा है जिसमें साहित्यकार केवल और ...
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