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Sunday, April 7, 2024

सरसी छंद / कबीर छंद

इंसान 

जगत की धूप में जल प्राणी, इस मन को रिझाओ,

सत्य की खोज में तो निकलो, भ्रमों को हराओ।

परिश्रम का आधार बनाओ, दुःख को भूल जाओ,

कबीर की वाणी में जी लो, सफर में खो जाओ।

गहन सा अभिमान भी सबके, मन में बसा न जाए, 

सोच-विचार में खो अमित अब, विषमता ही सताए।

जीवन के मेले में जब भी, माया फसल चुनना, 

सच्चे सतगुरु की शिक्षा ही , जीवन सफल बुन ना।

© अमित पाठक शाकद्वीपी 



‘प्रीत की डोर’ पुस्तक का सफल प्रकाशन

कहते हैं प्रेम आत्मीयता की वह अनुभूति है जिस से कोई भी प्राणी अछूता नहीं है। सभी एक दुसरे के लिए मन में स्नेह का भाव रखते हैं। ऐसा लगता है मानो ईश्वर ने हमें प्रीत की डोर से बांध दिया है। ईश्वर स्वयं भी प्रेम से परे नहीं। राधा कृष्ण हो या सिया राम इनकी प्रेम के परिचय मे तो पूरा सनातन धर्म समाहित है। मां पार्वती और भगवान शिव के प्रेम की तो उपमा ही नहीं है। प्रेम की उसी पवित्र भावना को साथ लेकर साहित्य संगम बुक्स प्रकाशन ने प्रीत की डोर नामक एक संकलन का विचार किया। आदरणीया वर्षा शिवांशिका जी के सहयोग से देखते ही देखते कई सुधी कलमकार इस संकलन से जुड़ने लगे । देश विदेश के इन गुणी रचनाकारो ने मानो कलम से जादू सा कर दिया और ऐसे ऐसे काव्य प्रस्तुति दी जिसे पढ़कर मन मयूर सा नृत्य करने लगा। आनन्द की अद्भुत अनुभूति में पूरा प्रकाशन मंडल ही झूम उठा। आज आपको सुचित करते हुए हमें अत्यंत हर्ष है कि हमारा यह नवीनतम संकलन अब प्रकाशित, मुद्रित और विक्रय हेतु उपल्ब्ध भी है। साथ ही ई कॉमर्स वेब साइट पर भी उपलब्ध है। साहित्य संगम बुक्स वर्ष 2022 से प्रति माह एक साझा संकलन प्रकाशित कर नए उभरते हुए साहित्यिक प्रतिभाओं को मनोबल देता है कि आप लिख सकते हैं और निश्चय ही श्रेष्ठ लेखन के लिए प्रेरणा देता है। अभी तक हजारों लोगों से जुड़ कर साहित्य संगम बुक्स मंच ने कई लोगो के लिए लेखन और साहित्य क्षेत्र में मार्ग प्रशस्त किया है। आदरणीय अमित पाठक शाकद्वीपी जी के विचार से सभी को एक अवसर तो अवश्य ही मिलना चाहिए। 

पुस्तक एवं प्रकाशन के तत्वाधान में : 
* प्रकाशन का नाम : साहित्य संगम बुक्स
* पता : स्टॉफ क्वार्टर ढोरी, फुसरो, बोकारो (झारखंड)
* प्रकाशन तिथि : दिनांक 01 अप्रैल 2024
* संस्था का उद्यम पंजीकरण संख्या : UDYAM-JH-01-0024515
* संस्था का जीएसटी पंजीकरण संख्या : 20CGKPP7865A1ZF
* आईएसबीएन संख्या : 9788196426538
* प्रकाशन का संपर्क सूत्र : 08935857296/09304444946

प्रतिलिप्याधिकार : 
सर्वाधिकार सुरक्षित । पुस्तक के किसी भी भाग को संपादक (अमित पाठक एवं वर्षा शिवांशिका) की स्पष्ट लिखित अनुमति के बिना किसी भी रुय में या किसी भी माध्यम से [ग्राफिक, इलेक्ट्रॉनिक या मैकेनिकल, जिसमें फोटोकॉपी, रिकॉर्डिंग, टेपिंग या सूचना पुनर्प्राप्ति प्रणाली शामिल है। या किसी डिस्क, टेय, छिद्रित मीडिया या अन्य सूचना भंडारण उपकरण पर पुनः प्रस्तुत या कॉपी नहीं किया जा सकता है। शर्त का उल्लंघन कानूनी कार्रवाई के लिए उत्तरदायी है। ऐसी सामग्री को पुनः प्रस्तुत करने के लिए प्राधिकरण संबंधित कॉपीराइट धारकों से प्राप्त किया जाना चाहिए।

आभार : 
हम आभारी हैं उस ईश्वर का जिनकी कृपा से हमारे इस संकलन का कार्य बिना किसी बाधा के कम समय में पूर्ण हुआ। हमारे इस संकलन का उद्देश्य सभी लेखकों को एकत्रित करना है। प्रेम के रंगो को आप सभी ने अपनी लेखनी से और भी रंगीन बना दिया है। हमारे काव्य संकलन को देश भर के कवियों ने कविता के रंगो से सजाया है।

प्रेम विषय को इंगित करती यह पुस्तिका देश भर के श्रेष्ठ कवि कवयित्रियों की अनूठी कृतियों से सुसज्जित साझा संकलन के रुप मे प्रस्तुत है। सभी कवियों ने अपनी रचनाएँ समय से पूर्व ही संकलन हेतु दे दी थी। आप सभी का प्यार व आशीर्वाद सदा बना रहे। आप सभी के सहयोग से हम इस कार्य को करने में सफल हुए।

आप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद ।

© साहित्य संगम बुक्स
ईमेल : sahityasangambooks2@gmail.com


अमित पाठक शाकद्वीपी सामाचार पत्र

Thursday, April 4, 2024

संगम

                संगम
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तुम गंगा कि अनुपम धारा,
मैं बहता हूं आवारा,
हम दोनों का मिलन है मुश्किल,
जाने जग ये सारा।

फिर भी मिल जाए जो दोनों,
तो अद्भुत हो ये नज़ारा,
कुछ तुम खुद को मेरी कर दो,
कुछ मैं हो जाऊं तुम्हारा।

आश मिलन की श्वास श्वास में,
पर मिल न पाए बेचारा,
यत्न सभी तो विफल रहे हैं,
कभी मिला न कोई इशारा।

मैं बहुं अब यमुना सा कल कल,
तकूं राह तुम्हारा,
चाह ह्रदय की प्रयाग है बनना,
और संगम हो मेरा तुम्हारा।

तुम गंगा कि अनुपम धारा,
मैं बहता हूं आवारा,
हम दोनों का मिलन हुआ तो,
झूमे जग ये सारा।

© अमित पाठक शाकद्वीपी 

Monday, April 1, 2024

सुन्दर रूप मनोहर

काली कजरारी सी नागिन लटें तेरी,
जो बांध ले पिया को इन्हीं नागफांस में,
नयन सरोवर जी में बह गयो चैन बैन,
सोचे मन मैं न बहुँ आए नहीं पास में।

गोरे तोरे रूप रंग और लालीमा के संग,
ऐसे जैसे रक्ताभ सूरज की फैली प्रकाश है,
होड़ जहां कितने है पश्चिमी वेश भूषा प्रति,
ऐसे में तू पारंपरिक परिधान में भी खास है।

कान की ये बाली तेरी स्वर्ण सितार कोई,
क्षण क्षण बाजे तो मृदु ध्वनि का विकास है,
देखे कोई तुझको को तो थाम लेवे ह्रदय को,
तेरी छवि दर्शन का ऐसा उल्लास है।

और क्या कहूं मैं भला करूं क्या तारीफ़ तेरी,
तेरी ही सुंदरता पे सब कुछ वार दिया,
लूट गए कई जानें कितने ही महारथी,
रूप की सुंदरता का कुछ ऐसा इतिहास है।

© अमित पाठक शाकद्वीपी 

Friday, March 29, 2024

अतिश्योक्ति

नीर निधि में खोज रहें व्यर्थ गोताखोर मोती,
मुक्तन सी धवल ओज की फैली है मुख पर ज्योति।
लंबे लंबे लट घुंघराले नागिन सी बलखाती,
दीप्त भाल पर चमके चांदनी उपमा ही नही होती।

कान की बाली होठ की लाली मन को हरता जाता,
न न कर के हृदय फिर भी सब कुछ करता जाता।
अधरन पर मुस्कान गजब यूं दिल को दे निमंत्रण,
नयन सरोवर में डूब रहें हैं जानें कितनो के मन।

© अमित पाठक शाकद्वीपी 



आशाओं के अंकुर

कागा जैसा रूप मिला,  और वाणी जैसे दादुर। पर अपनी मस्ती में  रहते वीर बहादुर।। इक इक कर सब साथ छूट गए, होते गये सभी दूर। अनगिनत च...