मेरे मन के दर्पण में
मैंने तेरी जो छवि बसाई,
कुछ और न देखा तब से
तुझको ही बस पाई
कदम कदम पर तुझे सहेजा,
तू ही मेरी कमाई
लम्हा लम्हा दिन रात मैं
तुझे ही खर्चती आई।
© अमित पाठक शाकद्वीपी
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