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Friday, January 5, 2024
Wednesday, January 3, 2024
रचनाकारों के लिए लेख
साहित्य का ये कैसा दौर... (लेख)
इन दिनों साहित्य ऐसे दौर से हो कर गुजर रहा है जिसमें साहित्यकार केवल और केवल प्रसिद्धि के लिए लालायित हैं। एक दौर था जब पाठक गण अपने प्रिय लेखक, कवि या कवयित्री की कविता ढूंढने के लिए महीनों समय लगा कर सम्बन्धित पत्र पत्रिकाओं में उनके लेख ढूंढते थे। किसी विशेषांक में ही साहित्यिक रचना मिलती थी। सामाचार पत्रों की प्रसिद्धि का यह भी एक महत्व पूर्ण कारण था । पर अब तो ऐसा लगता है कि हर व्यक्ति ही साहित्यकार बन गया है । लिखने वाले की संख्या अधिक है और पाठक गण कम होते जा रहे हैं। गिने चुने सामाचार पत्रों की जगह अब हर गली में प्रिटिंग प्रेस है जहां से रोज सैकड़ों पत्र पत्रिका जारी किए जा रहे हैं जिनका उद्देश पैसे कमाना है या प्रसिद्धि कमाना या दोनो ही। साहित्य के प्रचार प्रसार के लिए बस गिनी चुनी संस्थानों में कार्य जारी है शेष सभी लाभ अर्जन पर ही पूरी दृष्टि जमाए कार्य कर रहे हैं उन्हें साहित्य के न तो प्रसिद्धि से कोई खुशी और न साहित्य के पतन पर दुःख अनुभव होता है। हर दूसरा व्यक्ति किसी न किसी सोशल मीडिया माध्यम पर किसी आभासी साहित्यिक पटल का एडमिन बना बैठा है और खुद के लाभ के लिए लोग इक्कठा किए जा रहा है। आपकी रचना कैसी है? , उनके भाव कैसे हैं? , आपकी रचना में कितनी विसंगतियां है? – जैसे प्रश्नों पर कोई विचार नहीं होता। न ही आपकी लेखन कला को परिष्कृत करने के लिए आपके कविता या लेख की विसंगतियों पर आपका ध्यान आकृष्ट कराया जाता है। आप ने दो मिनट में तुक से तुक मिला कर कुछ पंक्तियां लिख दी और किसी ऐसे सामाचार पत्र या संस्था को भेज दिया जिनको स्वयं का अस्तित्व बनाए रखने में ही परेशानी हो रही है , यदी किसी रोज़ उनको रचना न मिले तो संभवतः उनका ही प्रकाशन ठप न हो पाए। हम और आप ऐसे ही सामाचार पत्रों के पिछे पागल हुए जा रहे। किसी सामाचार पत्र को क्या अधिकार है या क्या सीमाबध्यता हमें यह भी ज्ञात नहीं होता । हम बस अनभिज्ञ होते हुए खुद की प्रसिद्धि के लिए लिख दें रहें और दर्जनों लोगों को ईमेल कर दे रहें ताकि आपकी मेरी रचनाएं बस छप जाएं।
सुबह से शाम तक हम सब नए नए प्रकाशक, समाचारों पत्रिकाओं के लिए ईमेल ढूंढ कर रचनाएं भेजें जा रहें और फिर सुबह होते ही इस लिए भी चिंतित हैं कि मेरी कौन सी रचना कहां छपी , सम्बन्धित पेपर की कटिंग भी ढूंढ कर हम ही सबको भेज रहें। अर्थात हम ही अपने लिए लेखक, हम ही प्रेषक और हम ही पाठक भी बने बैठे है। दुसरे साथी रचनाकार की रचना हम पढ़ते भी नहीं है और आशा करते हैं कि हमारी रचना सभी लोग पढ़े। कटु है पर सत्य यही है कि हमे बस स्वयं की प्रसिद्धि चाहिए जो किसी भी तरीके से प्राप्त हो जाए। सुधार की तो हम सोचते ही नहीं है। सुधार का अनुभव ही नही महसूस किया तो कार्य क्या करें इस दिशा में। स्वयं से सजग बने और प्रतिष्ठित तथा विस्तृत सामाचार जो विधि संगत हो और सरकार द्वारा भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक कार्यालय (सूचना और प्रसारण मंत्रालय),सूचना भवन, सीजीओकॉम्लेक्स, लोधी रोड़, नई दिल्ली- 110003 द्वारा पंजीकृत हो और जिन्हे यहां से मूल RNI पंजीकरण संख्या प्राप्त है , ऐसे ही वास्तविक एजेंसी में अपनी रचनाएं भेजिए। पीआरबी अधिनियम, 1867 की धारा 5 स्पष्ट करती है कि भारत में समाचारपत्र इस अधिनियम में यथा निर्धारित नियमों के अनुरूप ही प्रकाशित किए जाएगें, इसके अलावा कोई भी समाचारपत्र प्रकाशित नहीं किया जाएगा। इस अधिनियम की धारा 11ख के तहत प्रकाशक द्वारा प्रकाशित प्रत्येक समाचारपत्र/पत्रिका की एक प्रति प्रेस पंजीयक को सौंपी जानी अनिवार्य है। इस प्रकार, देश में कोई पत्रिका/समाचारपत्र प्रकाशित करने के लिए भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक का कार्यालय में उसका पंजीयन एक आवश्यकता है। भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक का कार्यालय में किसी समाचारपत्र का पंजीयन दूसरों के द्वारा उसके शीर्षक का दुरुपयोग होने से भी बचाता है।
👉 ISSN संख्या क्या है?
अंतर्राष्ट्रीय मानक सीरियल नंबर ISSN एक धारावाहिक प्रकाशन की पहचान करने के लिए जारी आठ अंकों का सीरियल नंबर का एक प्रकार है।
ISSN एक विश्वव्यापी पहचान कोड है जिसका उपयोग प्रकाशकों, आपूर्तिकर्ताओं, पुस्तकालयों, सूचना सेवाओं, बार कोडिंग सिस्टम, यूनियन कैटलॉग आदि के लिए किया जाता है, जो पत्रिकाओं, समाचार पत्रों, समाचार पत्रों, निर्देशिकाओं, विज्ञापनों, विज्ञापनों, वार्षिक रिपोर्ट, मोनोग्राफ श्रृंखला जैसे धारावाहिकों के उद्धरण और पुनर्प्राप्ति के लिए होता है। भारत में इसे राष्ट्रीय विज्ञान पुस्तकालय द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। यह ISSN नंबर विशेष रूप से समान शीर्षक वाले प्रकाशनों के बीच अंतर करने में लाभदायक है। इन नंबरों का उपयोग क्रमबद्ध, सूचीकरण, पुस्तकालय में उधार और सीरियल साहित्य के उपयोग के लिए अन्य प्रथाओं के लिए किया जाता है। जब एक ही सामग्री वाला धारावाहिक एक से अधिक मीडिया प्रकारों में प्रकाशित होता है, तो प्रत्येक मीडिया प्रकार के लिए एक अलग ISSN सौंपा जाता है। उदाहरण के लिए, कई धारावाहिकों को प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दोनों में प्रकाशित किया जाता है। ISSN प्रणाली इन प्रकारों को ISSN (p- ISSN) और इलेक्ट्रॉनिक ISSN (e-ISSN) के रूप में संदर्भित करती है। एक लेखक के रुप में हम किसी भी प्रकाशक से आईएसएसएन पंजीकरण का नहीं पूछते और गैर विधिक पत्र–पत्रिका या संस्थान में अपनी छवि बिना किसी संकोच के अपनी रचना के साथ भेज देते हैं जिनके कुछ दुष्परिणाम भी हो सकते है। आज के इस रोबोट युग में आपकी छवि से छेड़ छाड़ कर उसे किसी भी अश्लील रूप में भी बदला जा सकता है और इसके लिए विशेष दक्षता की भी जरूरत नहीं । ऐसे में कुछ भी कही भी भेजने से पहले संस्थान/समूह और वहां से प्रकाशित होने वाली सामाचार पत्रों के लिए RNI पंजीकरण संख्या , पत्रिका या मैगजीन जनरल जो पुनरावृति में अलग अलग क्रम में छपते हैं उनके लिए ISSN संख्या और पुस्तको के प्रकाशन,मुद्रण और ऑनलाइन विक्रय के लिए ISBN संख्या का होना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। यदि इन पर ध्यान नहीं दिया गया तो आपको काफी ज्यादा तक नुकसान हो सकते हैं। आपकी रचना पर आपका अधिकार भी आप नही दर्शा सकते या आपकी छवि के गलत उपयोग भी संभव है। सोचे विचारे तब ही कहीं भी अपनी रचना भेजें ।
👉 नसीहत : अभी तक आपने सामाचार पत्र या पत्रिका की एजेंसी की सूची या उनके ईमेल अड्रेस की सूची बनाई थी अब उनमें से RNI पंजीकृत संस्थाओं को छांट कर केवल वास्तविक उचित संस्था में ही रचना प्रस्तुत करें। पत्रिकाओं के लिए भी ISSN संख्या वाले पत्रिकाओं की सूची तैयार कीजिए और पुस्तकों के लिए ISBN संख्या की भी जांच परख कर के ही उनसे संपर्क करें।
– अमित पाठक शाकद्वीपी
Saturday, December 30, 2023
पहला पहला प्यार
पहला पहला प्यार
सामने ही खड़ी थी दिल बेताब था कुछ कहने को,
इक पल सोचूं कह ही डालो इक पल सोचूं रहने दो।
लिए हाथों में गुलाब मैं सही वक्त आंकता रहा,
बोहोत देर तलक उनकी ओर ताकता रहा।
उनको न हुआ सब्र कुछ पूछ बैठे मुझसे,
ऐसे कैसे देख रहें हो यार अमित तुम ठीक हो,
बातो बातो में पूछ ही लिया क्या हाथों में छिपाया है,
प्रीत के इस मौसम में क्या कुछ उपहार मेरे लिए लाया है।
उस दिन हमने हौसला देकर दिल की बातें जहीर की,
भाव पहले से जान गई थी वो इस गुण में माहिर थी,
प्रेम के उस भाव को हम दोनों ने स्वीकार किया,
ये दिसंबर का ही था महिना जब दोनों ने प्यार किया,
संग संग चलना स्वीकार किया।
– अमित पाठक शाकद्वीपी
तू है एक कविता जैसी
तू है एक कविता जैसी
*************************
तू है एक कविता जैसी,
भाव बोध हजार है,
शोभित है यूं शब्द सरस ज्यों,
रोम रोम अलंकार है,
तू है एक कविता जैसी,
भाव बोध हजार है ।।
कभी वर्तनी तेरी सुधारूं
कभी अभिव्यक्ति पर अधिकार है
कहीं कभी तू हर शैली में सुंदर
मुखड़े पर ये बिंदी, नुक्ता सा श्रृंगार है
तू है एक कविता जैसी
भाव बोध हजार है ।।
सुबह निहारू सांझ पुकारू
गुनगुनाते बारंबार है
सरल सहज मृदुल मनमोहक
रस की कोई बौछार है
तू है एक कविता जैसी
भाव बोध हजार है ।।
प्रीत रीत की मीत बनी तू
अद्भुत सा संगीत बनी तू
रोगी से इस करुण हृदय का
ये कविता ही अब उपचार है
तू है एक कविता जैसी
भाव बोध हजार है ।।
– अमित पाठक शाकद्वीपी
Monday, December 25, 2023
अंतिम विदाई
कुछ खामोशियां अचानक से शोर हो गई,
आज मुहल्ले में जल्दी ही भोर हो गईं,
आज अंतिम विदाई थी मेरी,
थी सांसों की डोर खो गई।
बड़े अदब से आज व्यवहार हो रहा था,
अर्थी , पुष्प, पीतांबरी सब तैयार हो रहा था,
कुछ अपने धर कर हाथ पैर मेरा चीत्कार कर रहे थे,
“क्यूं छोड़ कर चले गए” ऐसा पुकार हो रहा था।
कुछ लोग चल पड़े थे लकड़ियां जुटाने,
कुछ लोग गए फ़िर डोम , पंडित जी और हजाम को बुलाने,
कुछ लेप चंदन का, कुछ तुलसी के पत्ते रख कर,
नए वस्त्र से मेरा अलंकार हो रहा रहा था।
चार कंधो पर कर के बारी बारी ,
नदी के एक तट पर रुकी भीड़ सारी,
नदी के उसी तट पर कुछ मंत्रोचार हो रहा था,
जानते हो क्या था?, पिण्ड दान का संस्कार हो रहा था।
सहसा ही मुझे लाद कर एक ऊंचे आसन पर लिटाया,
एक एक कर कई लकड़ियों से सजाया,
परिजन बैठे थे रेत पर
अंतेष्ठि के मुहूर्त पर कुछ विचार हो रहा था।
निर्णय से सबके फिर वह भी समय आया,
डोम ने अग्नि जलाई, हज्जाम बाल बनाया,
सब रो रहे थे मगर मुझको आनन्द आया
क्योंकि जीवन भर गालियां तानें देने वालों को भी वहीं पाया।
सबने की प्रदक्षिणा और मुखाग्नि लगाया,
पल भर में ही मैं दिव्य अग्नि में समाया।
जल से स्नान तो करते हैं सभी नित्य ही,
आज क्या ही दिन था मैं आग से नहाया ,
प्रभु में खुद को पाया।
– अमित पाठक शाकद्वीपी
सारे घाव पे मरहम जैसा राहत ये पहुंचाता है,****************************
सारे घाव पे मरहम जैसा राहत ये पहुंचाता है,
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हर मुख पर जय घोष प्रबल है,
हर हाथ भगवा लहराता है,
किए कितने संघर्ष जतन थे,
सब याद दिलाता जाता है,
सारे घाव पे मरहम जैसा राहत ये पहुंचाता है,
एक स्वर में श्री राम का नारा जब कानो में आता है।
श्यामल विमल स्वरूप मनोहर,
मेघवर्ण पीतांबर तन पर,
देख रूप की अद्भुत शोभा,
मन हरता सा जाता है
सारे घाव पे मरहम जैसा राहत ये पहुंचाता है,
एक स्वर में श्री राम का नारा जब कानो में आता है।
राम नाम से जीवन अपना,
अयोध्या धाम का सुंदर सपना,
राम नाम की अगणित महिमा
ग्रंथ यही बतलाता है,
सारे घाव पे मरहम जैसा राहत ये पहुंचाता है,
एक स्वर में श्री राम का नारा जब कानो में आता है।
– अमित पाठक शाकद्वीपी
Friday, December 22, 2023
ब्राह्मणों की महिमा
ब्राह्मण में ऐसा क्या है कि सारी
दुनिया ब्राह्मण के पीछे पड़ी है।
इसका उत्तर इस प्रकार है।
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदासजी
ने लिखा है कि भगवान श्री राम जी ने श्री
परशुराम जी से कहा कि →
"देव एक गुन धनुष हमारे।
नौ गुन परम पुनीत तुम्हारे।।"
हे प्रभु हम क्षत्रिय हैं हमारे पास एक ही गुण
अर्थात धनुष ही है आप ब्राह्मण हैं आप में
परम पवित्र 9 गुण है-
ब्राह्मण_के_नौ_गुण :-
रिजुः तपस्वी सन्तोषी क्षमाशीलो जितेन्द्रियः।
दाता शूरो दयालुश्च ब्राह्मणो नवभिर्गुणैः।।
● रिजुः = सरल हो,
● तपस्वी = तप करनेवाला हो,
● संतोषी= मेहनत की कमाई पर सन्तुष्ट,
रहनेवाला हो,
● क्षमाशीलो = क्षमा करनेवाला हो,
● जितेन्द्रियः = इन्द्रियों को वश में
रखनेवाला हो,
● दाता= दान करनेवाला हो,
● शूर = बहादुर हो,
● दयालुश्च= सब पर दया करनेवाला हो,
● ब्रह्मज्ञानी,
श्रीमद् भगवत गीता के 18वें अध्याय
के 42श्लोक में भी ब्राह्मण के 9 गुण
इस प्रकार बताए गये हैं-
" शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्म कर्म स्वभावजम्।।"
अर्थात-मन का निग्रह करना ,इंद्रियों को वश
में करना,तप( धर्म पालन के लिए कष्ट सहना),
शौच(बाहर भीतर से शुद्ध रहना),क्षमा(दूसरों के
अपराध को क्षमा करना),आर्जवम्( शरीर,मन
आदि में सरलता रखना,वेद शास्त्र आदि का
ज्ञान होना,यज्ञ विधि को अनुभव में लाना
और परमात्मा वेद आदि में आस्तिक भाव
रखना यह सब ब्राह्मणों के स्वभाविक कर्म हैं।
पूर्व श्लोक में "स्वभावप्रभवैर्गुणै:
"कहा इसलिएस्वभावत कर्म बताया है।
स्वभाव बनने में जन्म मुख्य है।फिर जन्म के
बाद संग मुख्य है।संग स्वाध्याय,अभ्यास आदि
के कारण स्वभाव में कर्म गुण बन जाता है।
दैवाधीनं जगत सर्वं , मन्त्रा धीनाश्च देवता:।
ते मंत्रा: ब्राह्मणा धीना: , तस्माद् ब्राह्मण देवता:।।
धिग्बलं क्षत्रिय बलं,ब्रह्म तेजो बलम बलम्।
एकेन ब्रह्म दण्डेन,सर्व शस्त्राणि हतानि च।।
इस श्लोक में भी गुण से हारे हैं त्याग तपस्या
गायत्री सन्ध्या के बल से और आज लोग उसी
को त्यागते जा रहे हैं,और पुजवाने का भाव
जबरजस्ती रखे हुए हैं।
*विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या।
*वेदा: शाखा धर्मकर्माणि पत्रम् l।*
*तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं।
*छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम् ll*
भावार्थ -- वेदों का ज्ञाता और विद्वान ब्राह्मण
एक ऐसे वृक्ष के समान हैं जिसका मूल(जड़)
दिन के तीन विभागों प्रातः,मध्याह्न और सायं
सन्ध्याकाल के समय यह तीन सन्ध्या(गायत्री
मन्त्र का जप) करना है,चारों वेद उसकी
शाखायें हैं,तथा वैदिक धर्म के आचार
विचार का पालन करना उसके पत्तों के
समान हैं।
अतः प्रत्येक ब्राह्मण का यह कर्तव्य है कि,,
इस सन्ध्या रूपी मूल की यत्नपूर्वक रक्षा करें,
क्योंकि यदि मूल ही नष्ट हो जायेगा तो न तो
शाखायें बचेंगी और न पत्ते ही बचेंगे।।
पुराणों में कहा गया है ---
विप्राणां यत्र पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता।
जिस स्थान पर ब्राह्मणों का पूजन हो वहाँ
देवता भी निवास करते हैं।
अन्यथा ब्राह्मणों के सम्मान के बिना देवालय
भी शून्य हो जाते हैं।
इसलिए .......
ब्राह्मणातिक्रमो नास्ति विप्रा वेद विवर्जिताः।।
श्री कृष्ण ने कहा-ब्राह्मण यदि वेद से हीन भी हो,
तब पर भी उसका अपमान नही करना चाहिए।
क्योंकि तुलसी का पत्ता क्या छोटा क्या बड़ा
वह हर अवस्था में कल्याण ही करता है।
ब्राह्मणोस्य मुखमासिद्......
वेदों ने कहा है की ब्राह्मण विराट पुरुष भगवान
के मुख में निवास करते हैं।
इनके मुख से निकले हर शब्द भगवान का ही
शब्द है, जैसा की स्वयं भगवान् ने कहा है कि,
विप्र प्रसादात् धरणी धरोहमम्।
विप्र प्रसादात् कमला वरोहम।
विप्र प्रसादात् अजिता जितोहम्।
विप्र प्रसादात् मम् राम नामम् ।।
ब्राह्मणों के आशीर्वाद से ही मैंने
धरती को धारण कर रखा है।
अन्यथा इतना भार कोई अन्य पुरुष
कैसे उठा सकता है,इन्ही के आशीर्वाद
से नारायण हो कर मैंने लक्ष्मी को वरदान
में प्राप्त किया है,इन्ही के आशीर्वाद से मैं
हर युद्ध भी जीत गया और ब्राह्मणों के
आशीर्वाद से ही मेरा नाम राम अमर हुआ है,
अतः ब्राह्मण सर्व पूज्यनीय है।
और ब्राह्मणों काअपमान ही कलियुग
में पाप की वृद्धि का मुख्य कारण है।
प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें।।
हर हर महादेव शिव शंभू 🔱
💐राज 🙏🏻
#जय_सनातन⛳.
#जय_ब्रह्मण_देव🚩🙏🏻
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