जय हो श्री शंकर सरकार।
त्रिभुवन महिमा अपरम्पार।।
जग के कारक पालक आप।
करते समन सकल संताप।।
पुनि पुनि धरूं चरण में शीश।
दया हो कैलाश के ईश।।
"देव" झुकाये निश दिन माथ।
उर में विराजित शंभुनाथ।।
व्याकुल सी जब राधिके चाहे कुछ आराम, सेज नहीं, न आसन भाये, चाहे केवल श्याम। कांधे पर जब शीश धरे, तब मन को हो विश्राम, प्रीत मीत ...
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