जय हो श्री शंकर सरकार।
त्रिभुवन महिमा अपरम्पार।।
जग के कारक पालक आप।
करते समन सकल संताप।।
पुनि पुनि धरूं चरण में शीश।
दया हो कैलाश के ईश।।
"देव" झुकाये निश दिन माथ।
उर में विराजित शंभुनाथ।।
कितना बेहतर जीवन था, दिन थे कितने गुलजार। उपवन बीच बसेरा अपना, पुष्पों की थी सजी बहार।। आए एकदिन राजकुंवर फिर करने को था रहा शिक...
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