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Tuesday, March 26, 2024

आई होली आई

*आई होली आई* 
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पूड़ी पकवान और गुजिया मिठाई,
दस्तक ये देती कि आई होली आई,
सूखे मेवे और खजूर छुहाड़े,
देखें जब थाल में तो मन गया ललचा रे।

छोले कहीं, कहीं पनीर कोफ्ते,
मन नहीं भरा जबकि खाए पूरे हफ्ते,
होलिका दहन से ही खुले मेरे भाग थे,
प्लेट में कई चीजें और फगुआ चैता वाले राग थे।

खाया खूब जमके खूब होली भी मनाई,
मन बोर हुआ तो पिली फिर ठंडाई,
भांग के असर में भी शाश्वत खड़े थे,
कुछ नहीं खाया सुबह से इसी बात पे अड़े थे।

भरी पिचकारी मारी छोड़ा नहीं किसी को,
सौहार्द का पर्व है रटाया ये भी सभी को
शाम को निकले फिर धूम मचाई,
रंग बिरंग सबको गुलाल भी लगाई,

लिए आशीष सबसे घर लौट आए जब,
परोस कर दही भल्लो के भी लिए लुत्फ तब,
खाया पिया मौज किया उल्लास में थे खो गए,
मिटा कर अंतर हम सब एक जैसे थे हो गए।

रोक लो समय को यहीं जब सबसे प्रेम मेल हों,
भुल के भेदभाव सभी तरंग उमंग से खेल हो,
बाजे ढ़ोल मृदंग और झूमे मन संग भी,
प्राकृतिक रंगो से खिले अंग अंग भी।

अब सोचता हूं दो दिन और ऐसी ही बाहर हों,
पुआ पकवान बने, रंगों की बौछार हो।
सबके लिए प्रेम भाव सबके दिल में प्यार हो,
कितना अच्छा हो गर रोज होली का त्यौहार हो।
© अमित पाठक शाकद्वीपी

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