अंबर से तू उतरी जैसे खेलने चली धरा पर,
इठलाती बलखाती चल दी थकी नहीं जरा भर,
ठुमक ठुमक कर बढ़ी चली तब सबकी प्यास बुझाई,
लाड किए सब जीवों से फिर मातृवत प्रेम निभाई।
कभी कहीं तू दौड़ी सरपट, कभी धीमी धीमी चल दी,
कभी कहीं जो पर्वत देखा तो, कूद पड़ी भी जल्दी,
कभी किसी को भींगा दिया है, कभी प्रेम से सींचा,
सबको कुछ तो उपहार देती फिरी, जैसी तेरी इच्छा।
बनकर रत्नाकर तूने उपजाए फिर रत्न कई,
ज्यों मां देती है जन्म शिशु को, था रिश्ता ये वैसा ही,
पाले पोषे कई जीव धरा पर, मृतकों को भी ग्रहण किया तब,
बनी स्वयं तू सृजिका या फिर कोई संहारिका जब।
उग्र हुईं तो पर्वत भी काटा बनकर दशरथ मांझी,
नारी शक्ति की परिचायक तू रानी जैसी झांसी,
तेरे बल की महिमा ऐसी है सब कुछ तुझको अर्पण,
तुझसे पूजन, तुझसे सिंचन, अर्घ्य दान और तर्पण।
© अमित पाठक शाकद्वीपी
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