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Monday, March 25, 2024

मानवीकरण अलंकार

रंग बिरंगी मोर पंख सा, सुन्दर तेरा मुखड़ा,
हंसी तेरी जब देखूं, भाग जाए तब दुखड़ा।
चंचल मन नाचे, फिर झूमे दिल की धड़कन,
कोयल जैसी वाणी तेरी, बोल शहद के मिश्रण।।

फुदक फुदक कर चलती हो तुम,जैसे कोई बुलबुल,
भोली भाली सुंदर सी तुम,भीतर मन से चुलबुल।
जिस पथ पर भी पांव धरो तुम, वो राहें मुस्काएं,
तेरे तन की ले कर खुशबू, हवाएं ये हर्षाएं।।

जब जब निकलो कहीं सड़क पर, लोग एक टक देखें,
अपने दिल के भाव के कंकड़, तेरी ओर वो फेंके।
जब जब देखो दर्पण कोई, दर्पण भी शर्माए,
असीमित सुंदरता तेरी वो ख़ुद में कैसे दर्शाए।।

मैं भी सोचूं पर न समझूं ये चांदनी क्यों इतराए,
कोई कभी चांदनी से बोले या परिचय तुझसे कराए।
होली के ये रंग इस तन पर इंद्र धनुष से लागे,
रति की सुंदरता भी फीकी तेरे सौंदर्य के आगे ।

© अमित पाठक शाकद्वीपी 



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