दुनियां हुईं है तेज इतनी,
बताई न आंकी जा सके जितनी,
बेपरवाह जिन्दगी लापरवाह हो गई है,
मस्तियां छूट गई तो दर्द आह हो गई है।
यकीनन कोई तो कहीं आस होगा,
वो गुजरा जमाना कभी पास होगा,
फिर से महक उन दिनों की जो होगी,
ए जिन्दगी तुम ऐसे कब साथ दोगी।
फिर से बिना बात बातें करेंगे,
सुकून के हवाले ये रातें करेंगे,
कभी इत्मीनान के दो लम्हे समेटे,
छोड़ कर ये भाग दौड़ पग धीमे धरेंगे।
अगर साथ चाहो तो आवाज़ देना,
साथ चलेंगे मगर साथ देना,
गम और खुशियां दोनों बांट लेंगे,
कुछ यूं फिर से वो यादें जिएंगे।
© अमित पाठक शाकद्वीपी
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