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Thursday, July 18, 2024
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आशाओं के अंकुर
कागा जैसा रूप मिला, और वाणी जैसे दादुर। पर अपनी मस्ती में रहते वीर बहादुर।। इक इक कर सब साथ छूट गए, होते गये सभी दूर। अनगिनत च...
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प्रेम पथिक की अभिलाषा का क्यों ऐसा उपहास किया, बार बार छलने को ही बस प्रयास किया। अनसुना कर गए बात और वादा भी कहां साकार है, निर्लज...
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हूँ कौन और किस लिए धरा पर, उस ईश्वर ने मुझे उतारा है। उसकी मर्जी वो ही जाने, सब उसका ही इशारा है।। नाम समान ही अमित अथाह मैं, उ...
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साहित्य का ये कैसा दौर... (लेख) इन दिनों साहित्य ऐसे दौर से हो कर गुजर रहा है जिसमें साहित्यकार केवल और ...
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